विस्तृत उत्तर
नाथ संप्रदाय हिंदू धर्म की एक प्रमुख शैव-योग परंपरा है जिसकी स्थापना गुरु मत्स्येंद्रनाथ से हुई और गुरु गोरखनाथ ने इसे व्यापक स्तर पर प्रचारित किया। इस संप्रदाय में भगवान शिव को 'आदिनाथ' के रूप में सर्वोच्च आराध्य माना जाता है।
नाथ संप्रदाय की शिव-उपासना की विशेषता — इस पंथ में शिव को 'अलख निरंजन' कहा जाता है — अर्थात जो प्रत्यक्ष दृष्टि से न दिखे, पर सर्वत्र व्याप्त हो। नाथ योगी एक-दूसरे का अभिवादन 'आदेश' शब्द से करते हैं जो 'ॐ' अर्थात परम पुरुष का प्रतीक है।
उपासना पद्धति — नाथ संप्रदाय में शिव की पूजा मुख्यतः तीन माध्यमों से होती है। पहला — शिवलिंग पूजन, जिसमें भस्म (विभूति) तिलक, बेलपत्र, धतूरा और जलाभिषेक की विशेष परंपरा है। दूसरा — हठयोग साधना, जिसमें शरीर के भीतर ही शिव-शक्ति का अनुभव किया जाता है। नाथ योगी मानते हैं कि शिव-शक्ति का मिलन मानव शरीर में ही होता है, बाहरी मंदिर से नहीं। तीसरा — गुरु-शिव की अभिन्नता, जहाँ गुरु को साक्षात शिव स्वरूप माना जाता है।
नाथ परंपरा की अनूठी विशेषता — नाथ योगी समाधि के उपरांत उस स्थान पर शिवलिंग स्थापित करते हैं। यह परंपरा उनकी जीवन-पर्यंत शिव-समर्पण की अभिव्यक्ति है।





