विस्तृत उत्तर
शिखा (चोटी) रखना हिंदू संस्कृति की एक प्राचीन परंपरा है जिसकी जड़ें वेदों और उपनिषदों तक जाती हैं। इसका धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों प्रकार का महत्व है।
धार्मिक महत्व — शिखा को ब्रह्मरंध्र का रक्षक माना जाता है। सहस्रारचक्र — जो सिर के शीर्ष पर स्थित है — मनुष्य की सर्वोच्च आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। शास्त्रों में इसे 'इंद्रयोनि' भी कहा गया है। शिखा रखने की परंपरा मुंडन संस्कार के समय और उपनयन संस्कार के समय विशेष रूप से स्थापित की जाती है। पूजा, यज्ञ और कर्मकांड के दौरान शिखा रखना अनिवार्य माना गया है। गाय के खुर के बराबर आकार की शिखा शास्त्रसम्मत मानी गई है क्योंकि सहस्रारचक्र का आकार भी उतना ही होता है।
वैज्ञानिक कारण — शिखा जिस स्थान पर रखी जाती है उसके ठीक नीचे मस्तिष्क का केंद्र-बिंदु होता है जहाँ से शरीर के समस्त अंगों, बुद्धि और मन का नियंत्रण होता है। इस स्थान पर सुषुम्ना नाड़ी का शीर्ष होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार यह मस्तिष्क का सबसे संवेदनशील भाग है। शिखा इस स्थान की सुरक्षा करती है — बाहरी ठंड और आघात से। पीनियल ग्लैंड (जिसे आयुर्वेद में आत्मा का प्रतीक माना गया है) इसी स्थान के निकट है। शिखा रखने से सहस्रार चक्र जागृत रहता है जिससे बुद्धि, विवेक और निर्णय-शक्ति मजबूत होती है। शिखा का दबाव रक्त संचार को नियंत्रित करता है और आँखों की ज्योति पर भी इसका अनुकूल प्रभाव बताया गया है।
