जप के पुण्य को देवराज इंद्र द्वारा हरे जाने से बचाने और उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा को वापस अपने शरीर में समाहित करने के लिए आसन के नीचे जल छोड़ा जाता है।
जप पूरा होने के बाद आसन के नीचे जल छोड़कर उसे मस्तक से लगाने की क्रिया को साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम माना गया है।
जप करते समय साधक के शरीर में अत्यधिक तपोबल और आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न होती है।