विस्तृत उत्तर
जप पूरा होने के बाद आसन के नीचे जल छोड़कर उसे मस्तक से लगाने की क्रिया को साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम माना गया है। जप करते समय साधक के शरीर में अत्यधिक तपोबल और आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न होती है।
शास्त्रों के अनुसार, यदि साधक जप पूर्ण होने पर एकदम से आसन छोड़कर उठ जाता है, तो देवराज इंद्र उस जप के संपूर्ण पुण्य और ऊर्जा को हर लेते हैं। जल को ब्रह्म (ईश्वर) का स्वरूप माना जाता है। आसन के नीचे जल की कुछ बूंदें गिराकर जब साधक उसे अपने नेत्रों और मस्तक से लगाता है, तो वह ऊर्जा पृथ्वी में समाहित होने या बिखरने के बजाय वापस साधक के आज्ञा चक्र में प्रविष्ट हो जाती है। यह प्रक्रिया साधना के फल को व्यक्तिगत रूप से सुरक्षित रखने का एक तांत्रिक और कर्मकांडीय उपाय है।





