कबीर के दोहे निर्गुण भक्ति, सरल ज्ञान, पाखंड-विरोध और मृत्यु-चेतना सिखाते हैं। 'कस्तूरी कुंडल बसे...' जैसे दोहे बताते हैं — ईश्वर भीतर है, बाहर मत खोजो।
कबीरदास (लगभग 1398-1518) भक्तिकाल की निर्गुण भक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।
उनके दोहे आध्यात्मिक शिक्षा के लिए अतुलनीय उपकरण हैं।