विस्तृत उत्तर
कबीरदास (लगभग 1398-1518) भक्तिकाल की निर्गुण भक्ति धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनके दोहे आध्यात्मिक शिक्षा के लिए अतुलनीय उपकरण हैं।
कबीर के दोहों की आध्यात्मिक उपयोगिता इन कारणों से है —
पहली बात — निर्गुण भक्ति का प्रतिनिधित्व। कबीर ने ईश्वर को किसी एक रूप में नहीं बाँधा। उनके 'राम' निराकार परब्रह्म हैं — न मूर्ति में, न मंदिर में, बल्कि हर जीव में। 'कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि' — यह दोहा बताता है कि ईश्वर तुम्हारे भीतर है, बाहर मत खोजो।
दूसरी बात — सरल व्यावहारिक ज्ञान। कबीर ने जटिल वेदांत को सामान्य जन की भाषा में कहा। 'निंदक नियरे राखिए आँगन कुटि छवाय' — इसमें मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों सत्य हैं।
तीसरी बात — पाखंड-विरोध। कबीर ने धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास की खुलकर आलोचना की — इससे साधक को बाहरी आडंबर से हटाकर अंतर्मुखी बनने में सहायता मिलती है।
चौथी बात — मृत्यु-चेतना। 'काल करे सो आज कर, आज करे सो अब' — यह दोहा अनित्यता का स्मरण कराकर साधक को वर्तमान में भक्ति करने को प्रेरित करता है।
कबीर के दोहे सिख धर्म के गुरुग्रंथ साहिब में भी सम्मिलित हैं, जो उनकी सार्वभौमिकता का प्रमाण है।





