विस्तृत उत्तर
मीराबाई (1498-1547) सोलहवीं शताब्दी की राजस्थान की संत-कवयित्री थीं जिन्होंने श्रीकृष्ण को अपना पति मानकर उन्हें समर्पित हजारों पद रचे। उनके भजन आज पाँच सदियों बाद भी उतने ही जीवंत और लोकप्रिय हैं — इसके कई कारण हैं।
पहला कारण — प्रेम की प्रामाणिकता। मीरा के भजनों में कोई शास्त्रीय जटिलता नहीं, कोई दिखावा नहीं। राजमहल छोड़ा, ससुराल की यातनाएं सहीं, विष के प्याले पिए — फिर भी गाती रहीं। यह प्रेम का इतना सच्चा रूप है कि सुनने वाले का हृदय स्वतः झनझना उठता है।
दूसरा कारण — सरल भाषा। मीराबाई ने ब्रजभाषा, राजस्थानी और हिंदी के मिश्रण में रचना की। कोई शब्द कठिन नहीं, कोई भाव अटपटा नहीं। 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई' — यह पंक्ति पढ़ते ही हृदय तक पहुँचती है।
तीसरा कारण — सार्वभौमिक विरह-प्रेम। मीरा का भजन केवल कृष्ण-भक्ति नहीं — यह हर उस आत्मा की कहानी है जो किसी से गहरे प्रेम करती है और उसकी प्रतीक्षा में जीती है। 'पायो जी मैंने राम रतन धन पायो' — यह आत्मा की पुकार है जो हर काल में प्रासंगिक है।
चौथा कारण — नारी-स्वतंत्रता का प्रतीक। मीरा ने राजपाट, समाज और परिवार की बंदिशें तोड़कर भक्ति का मार्ग चुना। यह साहस आज भी प्रेरणा देता है।
प्रसिद्ध भजन — 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई', 'पायो जी मैंने राम रतन धन पायो', 'पग घुंघरू बाँध मीरा नाची रे।'





