विस्तृत उत्तर
सूरदास (1478-1583) अष्टछाप के कवियों में सर्वश्रेष्ठ और भक्तिकाल की सगुण कृष्ण-भक्ति धारा के महान कवि थे। वल्लभाचार्य के शिष्य होने के कारण उनके पद पुष्टिमार्ग की भक्ति-परंपरा में विशेष महत्व रखते हैं।
सूरदास के पद कृष्ण-भक्ति में कैसे सहायक हैं —
पहला — बाल-लीला का अद्भुत चित्रण। सूरदास ने कृष्ण के बाल-रूप — माखन चुराते, मइया से शिकायत करते, यशोदा की गोद में हँसते — इन दृश्यों को इतनी जीवंतता से चित्रित किया है कि पढ़ते ही भक्त का हृदय वात्सल्य-भाव से भर जाता है। वात्सल्य-भक्ति जागृत होने का यह सर्वोत्तम माध्यम है।
दूसरा — माधुर्य-भाव। सूर के पदों में श्रीकृष्ण का सौंदर्य इतना मनोहर वर्णित है कि पाठक भावावस्था में आ जाता है। 'मैया मोरी मैंने माखन नाहीं खायो' — यह पंक्ति मन में कृष्ण की छवि जागृत करती है।
तीसरा — विरह-भाव। सूर के विरह-पद — जहाँ गोपियाँ कृष्ण के मथुरा जाने के बाद तड़पती हैं — भक्त को ईश्वर के प्रति व्याकुलता जगाते हैं। यही व्याकुलता भक्ति का परम रूप है।
चौथा — ब्रजभाषा की मधुरता। सूरदास के पद ब्रजभाषा में हैं — इस भाषा की अपनी एक नैसर्गिक मधुरता है जो मन को सीधे कृष्ण की तरफ ले जाती है।
सूरसागर में लगभग एक लाख पद संकलित बताए जाते हैं जो कृष्ण-भक्ति का विश्वकोश है।




