विस्तृत उत्तर
मीराबाई (लगभग 1498-1557 ई.) राजस्थान की राजपूत राजकुमारी और कृष्ण की परम भक्त थीं। उन्होंने कृष्ण को अपना पति मान लिया और सांसारिक जीवन त्यागकर भक्ति में समर्पित हो गईं।
मीरा ने क्या सहा
- 1ससुराल में अपमान — मेड़ता की राजकुमारी मीरा का विवाह मेवाड़ के राणा भोजराज से हुआ। पति की मृत्यु के बाद ससुराल (राणा विक्रमादित्य/उदयसिंह) ने उन्हें अपमानित किया।
- 1विष — परंपरा के अनुसार राणा ने मीरा को विष का प्याला भिजवाया — मीरा ने कृष्ण नाम लेकर पी लिया, कोई प्रभाव नहीं हुआ — ऐसी भक्ति परंपरा की मान्यता है।
- 1सांप — फूलों की टोकरी में सांप भिजवाया — वह शालिग्राम/माला बन गया (भक्ति परंपरा अनुसार)।
- 1कांटों का बिस्तर — सोने के लिए कांटों की शय्या दी गई।
- 1सामाजिक बहिष्कार — राजपूत कुल की मर्यादा तोड़कर सार्वजनिक रूप से कृष्ण भजन गाना, साधु-संतों के साथ उठना-बैठना — यह उस युग में अत्यंत अपमानजनक माना गया।
- 1घर त्याग — अंततः मीरा ने राजमहल छोड़कर वृंदावन और द्वारका में कृष्ण भक्ति में जीवन बिताया।
मीरा के प्रसिद्ध पद
- ▸'मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई'
- ▸'पायो जी मैंने राम रतन धन पायो'
- ▸'मैं तो चाकर राम की'
शिक्षा
- ▸सच्ची भक्ति सब कष्ट सहन करने की शक्ति देती है।
- ▸भक्ति में लोक-लाज, राज-पाट, परिवार — सब गौण हो जाते हैं।
- ▸मीरा ने दिखाया कि स्त्री भक्ति, कविता और आध्यात्मिकता में पुरुषों से किसी भी तरह कम नहीं।
ध्यान दें: मीरा की जीवनी के कई विवरण परंपरागत हैं — विष, सांप जैसी घटनाओं का ऐतिहासिक प्रमाण अनिश्चित है। परंतु उनकी भक्ति, कविता और सामाजिक साहस निर्विवाद है।





