विस्तृत उत्तर
श्री रामकृष्ण परमहंस (1836-1886) दक्षिणेश्वर काली मंदिर (कोलकाता) के पुजारी और 19वीं शताब्दी के महानतम आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे।
काली भक्ति का स्वरूप
- 1माँ-पुत्र संबंध — रामकृष्ण ने काली को अपनी माँ माना — सांसारिक माँ नहीं, ब्रह्मांडीय माता। वे काली को 'माँ' कहकर संबोधित करते और बालक की भांति व्यवहार करते।
- 1साक्षात दर्शन — रामकृष्ण काली माँ का साक्षात दर्शन करते थे, उनसे बात करते, भोजन खिलाते, रोते-हंसते। यह सामान्य पूजा नहीं, जीवंत संबंध था।
- 1भाव समाधि — काली का नाम सुनते ही या भजन सुनते ही वे भावसमाधि में चले जाते — बाह्य चेतना शून्य, आंखें स्थिर, शरीर निश्चल।
- 1उन्मत्त भक्ति का काल — प्रारंभिक वर्षों में रामकृष्ण की भक्ति इतनी तीव्र थी कि लोग उन्हें पागल समझते थे। वे दिन-रात माँ काली को पुकारते, भोजन-नींद भूल जाते।
- 1तलवार उठाना — एक बार जब काली दर्शन नहीं हो रहे थे, रामकृष्ण ने मंदिर में तलवार उठाकर आत्मघात करने चाहा — तभी काली का दर्शन हुआ और वे समाधि में डूब गए। (यह रामकृष्ण कथामृत में वर्णित है।)
काली भक्ति से परे — सर्वधर्म समभाव
काली भक्ति आरंभ बिंदु थी। बाद में रामकृष्ण ने:
- ▸अद्वैत साधना (तोतापुरी से) — निर्विकल्प समाधि प्राप्त
- ▸इस्लाम और ईसाई धर्म की साधना भी की
- ▸निष्कर्ष — 'जतो मत ततो पथ' — जितने मत हैं, उतने ही ईश्वर तक के मार्ग हैं। सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।
विरासत: रामकृष्ण की शिक्षाओं को विवेकानंद ने विश्वभर में फैलाया। रामकृष्ण मिशन उनकी ही प्रेरणा से स्थापित।
ध्यान दें: रामकृष्ण का जीवन वृत्तांत मुख्यतः 'श्रीश्रीरामकृष्ण कथामृत' ('M'/महेंद्रनाथ गुप्त रचित) पर आधारित है — यह प्रामाणिक प्राथमिक स्रोत है।





