विस्तृत उत्तर
नरसी मेहता (1414-1480 ई.) गुजराती भक्ति साहित्य के आदि कवि और परम कृष्णभक्त थे। उनका जन्म जूनागढ़ (सौराष्ट्र) के पास तलाजा ग्राम में एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। माता-पिता का बाल्यावस्था में ही देहांत हो गया और वे 8 वर्ष तक गूंगे रहे। एक वैष्णव संत के आशीर्वाद से उन्हें वाणी मिली। दादी जयगौरी ने उनका पालन-पोषण किया।
नरसी का पूरा जीवन भजन-कीर्तन में बीतता था। एक दिन भाभी ने व्यंग्य किया — 'ऐसी भक्ति है तो भगवान से मिलकर क्यों नहीं आते?' इस व्यंग्य ने नरसी के जीवन में चमत्कारिक मोड़ लाया। वे गोपेश्वर महादेव के मंदिर में गए और सात दिन कठोर उपासना की। भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें द्वारका ले जाकर श्रीकृष्ण की रासलीला का दर्शन कराया। यहीं से नरसी की परम कृष्णभक्ति की यात्रा आरंभ हुई।
प्रमुख चमत्कार-प्रसंगों में 'हुंडी' (धनादेश) का प्रसंग सबसे प्रसिद्ध है। शरारती लोगों ने तीर्थयात्रियों से नरसी की हुंडी लिखवाई — द्वारका पहुँचने पर श्रीकृष्ण ने स्वयं 'श्यामल शेठ' का रूप धारण कर उसका भुगतान किया। पिता के श्राद्ध के प्रसंग में नरसी घी लाने जाते-जाते कीर्तन में खो गए — भगवान स्वयं नरसी का रूप धारण कर घी ले आए। और 'नानी बाई का मायरो' — नरसी की नातिन के विवाह में जब वे निर्धन होने के कारण मायरा भरने में असमर्थ थे, तब श्रीकृष्ण ने स्वयं सारी व्यवस्था की।
उनकी रचना 'वैष्णव जन तो तेणे कहिए जे पीड पराई जाणे रे' महात्मा गांधी का प्रिय भजन था।





