विस्तृत उत्तर
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है जो लगभग 14वीं से 17वीं शताब्दी तक फैला है। इस काल में दो प्रमुख धाराएँ थीं — निर्गुण भक्ति (निराकार ईश्वर की उपासना) और सगुण भक्ति (साकार राम-कृष्ण की उपासना)।
निर्गुण भक्ति के प्रमुख संत:
संत कबीरदास (लगभग 1398-1518 ई.) — काशी के संत, निर्गुण भक्ति के शिखर पुरुष। उनकी साखियों और दोहों में पाखंड का खंडन और ईश्वर की सर्वव्यापकता का संदेश है। गुरु रामानंद के शिष्य।
संत रैदास (रविदास, 15वीं शताब्दी) — समाज के सभी वर्गों के लिए भक्ति का समान अधिकार।
गुरु नानक देव (1469-1539 ई.) — सिख धर्म के प्रवर्तक, जिनकी रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में हैं।
दादू दयाल (1544-1603 ई.) — राजस्थान में निर्गुण भक्ति के प्रचारक।
सगुण भक्ति — राम भक्ति शाखा:
गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623 ई.) — रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली के रचनाकार। हिंदी साहित्य के महाकवि।
सगुण भक्ति — कृष्ण भक्ति शाखा:
सूरदास (1478-1583 ई.) — सूरसागर के रचयिता, कृष्ण की बाललीलाओं के अद्भुत चितेरे।
मीराबाई (1498-1547 ई.) — राजस्थान की कृष्णभक्त राजकुमारी जिन्होंने सामाजिक बंधन तोड़कर भक्ति मार्ग अपनाया।
नरसी मेहता (1414-1480 ई., जूनागढ़) — गुजराती भक्ति साहित्य के आदि कवि, 'वैष्णव जन तो' के रचनाकार।
चैतन्य महाप्रभु (1486-1534 ई.) — बंगाल के गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक, हरे कृष्ण नामसंकीर्तन के प्रचारक।
रसखान (16वीं शताब्दी) — मुस्लिम होते हुए भी कृष्णभक्ति में लीन कवि।




