ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
Katha

संतोषी माता व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पौराणिक पाठ

📿 पौराणिक5 मिनट पढ़ें
WhatsApp

श्री संतोषी माता की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा

यह आलेख संतोषी माता के व्रत के दिन पढ़ी और सुनी जाने वाली पारंपरिक, लोक-प्रचलित एवं प्रामाणिक व्रत कथा का एक अक्षुण्ण, क्रमबद्ध और अत्यंत विस्तृत प्रस्तुतीकरण है। संतोषी माता की कथा का मूल आधार प्राचीन वेदों या प्रमुख अठारह पुराणों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता, अपितु यह उत्तर भारत की उन अत्यंत गहरी और समृद्ध लोक-परंपराओं (Folk Traditions) से उत्पन्न है, जिन्हें पीढ़ियों से महिलाओं द्वारा पारिवारिक परिसरों और घरेलू स्थानों (Domestic spaces) में मौखिक रूप से सहेजा और हस्तांतरित किया गया है । कालान्तर में यही लोक-कथाएं व्रत-पुस्तिकाओं के रूप में मुद्रित हुईं और आज यही पारंपरिक पाठ प्रत्येक शुक्रवार को श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है ।

इस कथा के वाचन का मुख्य उद्देश्य मन में संतोष, धैर्य और अटूट श्रद्धा की स्थापना करना है। परंपरागत रूप से इस व्रत कथा के मुख्य रूप से दो प्रमुख संस्करण और एक अन्य लोक-प्रचलित लघु संस्करण प्राप्त होता है। इन सभी संस्करणों को पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं के आधार पर उनके पूर्ण, असंपादित और विशुद्ध लोक-स्वरूप में नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है ।

कथा संस्करण कथा का मूल विषय पारंपरिक स्रोत
प्रथम संस्करण श्री संतोषी माता की प्राकट्य एवं जन्म कथा पौराणिक आख्यान एवं लोक-परंपरा का सम्मिश्रण
द्वितीय संस्करण सात पुत्रों और निर्धन बहू की संपूर्ण कथा विशुद्ध पारंपरिक लोक-कथा (व्रत पुस्तिकाओं का मुख्य भाग)
तृतीय संस्करण राजा, जंवाई और रानी चंपा की कथा क्षेत्रीय लोक-प्रचलित कथा का लघु संस्करण

1. कथा का पारंपरिक प्रारंभ और मंगलाचरण

पारंपरिक रूप से शुक्रवार के दिन जब व्रती महिलाएं और श्रद्धालु कथा श्रवण हेतु एकत्र होते हैं, तो कथा आरंभ करने से पूर्व हाथों में सवा रुपए का गुड़ और भुने हुए चने का प्रसाद लिया जाता है, तथा एक कलश की स्थापना की जाती है । कथावाचक या घर की कोई वयोवृद्ध महिला कथा का वाचन आरंभ करती हैं। कथा के मध्य में श्रोताओं द्वारा श्रद्धापूर्वक 'जय संतोषी माता' का जयघोष किया जाता है ताकि ध्यान माता के चरणों में केंद्रित रहे ।

कथा का आरंभ पारंपरिक मंगलाचरण, भजनों और माता के ध्यान से किया जाता है। व्रत-पुस्तिकाओं में वर्णित आरंभिक वंदना के स्वर इस प्रकार हैं:

"जो कोई जन गावे, मैया जो कोई जन गावे।
रिद्धि सिद्धि सुख संपत्ति, जी भर के पावे॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपत्ति दाता॥"

इसके पश्चात् कथा की महिमा का गान करते हुए निम्नलिखित पारंपरिक पंक्तियां पढ़ी जाती हैं, जो व्रत की प्राचीनता और प्रसाद की महत्ता को दर्शाती हैं:

"प्राचीन काल से सुनी है जाती, जो ये कही कथा।
सोलह शुक्रवार की भक्तों, तब से चली प्रथा॥
गुड़ और चने का भोग मात को, लगाया जाता है।
वही प्रसाद तो भक्तों में, बंटवाया जाता है॥
सुख संतोष मिले सुनकर, सब दुख मिट जाते हैं।
हम कथा सुनाते हैं, ये संतोषी माता, सुख संपत्ति के दाता॥"

इन वंदना पंक्तियों के सस्वर पाठ के पश्चात् मुख्य कथा का वाचन पूरी श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ आरंभ होता है。


2. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)

परंपरागत व्रत-पुस्तिकाओं और लोक-मान्यताओं में संतोषी माता की कथा के विभिन्न स्वरूप पाए जाते हैं। व्रत के दिन इन सभी आख्यानों का वाचन अत्यंत शुभ माना जाता है। अतः प्रत्येक प्रमुख संस्करण को यहाँ पृथक शीर्षक के अंतर्गत पूर्ण विस्तार के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है。

प्रथम संस्करण: श्री संतोषी माता प्राकट्य एवं जन्म कथा (पौराणिक-लोक मिश्रित आख्यान)

यह कथा संतोषी माता के जन्म, उनके नामकरण और उनके प्राकट्य के संदर्भ में सुनाई जाती है। इसका मूल आधार लोक-परंपरा है, जिसे भगवान श्री गणेश के आख्यानों के साथ अत्यंत सुंदरता से जोड़ा गया है ।

सृष्टि के आरंभिक काल की बात है, एक बार रक्षाबंधन का अत्यंत पवित्र और पावन त्योहार था। कैलाश पर्वत पर आनंद का वातावरण था। भगवान श्री गणेश अपनी बहन ज्योति (जिन्हें मनसा देवी भी कहा जाता है) से विधि-विधान पूर्वक रक्षा-सूत्र (राखी) बंधवा रहे थे । बहन ने अपार स्नेह के साथ अपने भाई भगवान गजानन की कलाई पर राखी बांधी। इसके प्रत्युत्तर में भगवान गणेश ने अपनी बहन को अपार धन, संपदा, सुख-समृद्धि और रक्षा का आशीर्वाद तथा बहुमूल्य उपहार प्रदान किए。

भगवान गणेश के दो अत्यंत तेजस्वी पुत्र थे, जिनका नाम शुभ और लाभ था। वे दोनों बालक वहां उपस्थित थे और अपनी बुआ तथा पिता के बीच चल रहे इस स्नेहपूर्ण अनुष्ठान और उपहारों के लेन-देन को अत्यंत कौतूहल और ध्यान से देख रहे थे ।

बालक शुभ और लाभ ने अपनी माताओं, रिद्धि और सिद्धि से इस अनुष्ठान का अर्थ और कारण पूछा। माताओं ने उन्हें रक्षाबंधन के महान पर्व का महत्व समझाया और बताया कि यह धागा केवल एक सामान्य धागा नहीं है, अपितु यह एक अभेद्य रक्षा-कवच है। यह रक्षा-सूत्र भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का प्रतीक है ।

यह सुनकर शुभ और लाभ अत्यंत उत्साहित हुए और उनके बाल-मन में भी एक बहन की लालसा जाग उठी। वे दौड़कर अपने पिता भगवान गणेश के पास गए और हठ करने लगे कि "हे पिताजी! यदि इस रक्षा-सूत्र का इतना अधिक महत्व है, और यह प्रेम का इतना बड़ा प्रतीक है, तो हमें भी एक बहन चाहिए। हम भी अपनी कलाई पर अपनी बहन से राखी बंधवाना चाहते हैं और उसकी रक्षा का वचन देना चाहते हैं। कृपया हमें एक बहन प्रदान करें" ।

भगवान श्री गणेश, जो विघ्नहर्ता और अपने भक्तों तथा पुत्रों की मनोकामना सदैव पूर्ण करने वाले हैं, अपने पुत्रों के इस पवित्र बाल-हठ को टाल न सके। अपने पुत्रों की इच्छा को पूर्ण करने हेतु भगवान गणेश ने अपनी दिव्य शक्तियों का आवाहन किया। उसी समय भगवान गणेश के असीम तेज और उनकी दोनों पत्नियों—रिद्धि और सिद्धि—की आत्मशक्ति के शुभ संयोग से एक ज्योति उत्पन्न हुई। उस दिव्य ज्योति ने देखते ही देखते एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और अलौकिक कन्या का रूप धारण कर लिया । इस दिव्य कन्या के प्राकट्य पर आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की और दुंदुभियां बजाईं。

उस नवजात दिव्य कन्या ने अत्यंत प्रेम से अपने दोनों भाइयों, शुभ और लाभ की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा। शुभ और लाभ के पास उस समय अपनी नवजात बहन को उपहार में देने के लिए कोई बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण या आभूषण नहीं था। उनके हाथों में केवल थोड़ा सा गुड़ और भुना हुआ चना ही था। उन्होंने अपनी बहन को वही गुड़ और चना अत्यंत प्रेम और लज्जा के साथ भेंट किया。

उस दिव्य कन्या ने उस अत्यंत साधारण, अल्प और मूल्यहीन प्रतीत होने वाली भेंट को भी सहर्ष, बिना किसी शिकायत के और पूरे संतोष के साथ स्वीकार किया। उस गुड़ और चने को पाकर वह कन्या अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट हुई ।

वहां देवर्षि नारद और अन्य देवता उपस्थित थे। जब उन्होंने देखा कि यह कन्या बिना किसी बहुमूल्य रत्न या स्वर्ण की कामना किए, केवल साधारण गुड़ और चने के प्रसाद से ही पूर्ण रूप से संतुष्ट और प्रसन्न हो गई है, तो देवर्षि नारद ने उद्घोष किया, "हे पुत्री! तुम अत्यंत अल्प भेंट में ही संतुष्ट हो जाने वाली हो। तुम्हारे भीतर संतोष का अथाह सागर है। अतः आज से इस चराचर जगत में तुम्हारा नाम 'संतोषी' होगा।"

तभी से वह दिव्य कन्या 'संतोषी माता' के नाम से तीनों लोकों में विख्यात हुई। वे संतोष, सुख, शांति और वैभव की देवी कहलाईं, जो केवल शुक्रवार के दिन गुड़ और चने के साधारण भोग से प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सभी दुखों का नाश कर देती हैं ।


द्वितीय संस्करण: सात पुत्रों और निर्धन बहू की संपूर्ण पारंपरिक व्रत कथा (विशुद्ध लोक-कथा)

यही वह मुख्य, सबसे विस्तृत और सर्वाधिक प्रचलित कथा है, जिसे 'सोलह शुक्रवार व्रत कथा' के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक शुक्रवार को घर-घर में और मंदिरों में इसी कथा का वाचन पूर्ण विस्तार के साथ किया जाता है। यह कथा मानवीय संवेदनाओं, पारिवारिक क्लेश, घोर कष्टों और अंततः माता की असीम कृपा से संकट निवारण का पूर्ण वृत्तांत है ।

इस विस्तृत कथा के मुख्य पात्रों का विवरण इस प्रकार है:

पात्र कथा में भूमिका
बुढ़िया माता भेदभाव करने वाली सास, जो अपने छोटे बेटे और बहू को कष्ट देती है।
सातवां (छोटा) बेटा सीधा-सादा पुत्र, जो माता के छल को देखकर परदेस चला जाता है।
निर्धन/उपेक्षित बहू कथा की मुख्य नायिका, जो घोर यातनाएं सहती है और संतोषी माता का व्रत करती है।
जेठानियां/ननद ईर्ष्यालु स्त्रियां, जो बहू से कठोर श्रम करवाती हैं और उद्यापन भंग करवाती हैं।
साहूकार परदेस का व्यापारी, जो छोटे बेटे की ईमानदारी देखकर उसे साझीदार बनाता है।

एक निर्धन/उपेक्षित बहू का परिचय और माता का पक्षपात

प्राचीन काल की बात है, किसी नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उस बुढ़िया के सात बेटे थे। सात बेटों में से छह बेटे व्यापार और कामकाज करते थे तथा धन कमाकर लाते थे। परंतु जो सातवां और सबसे छोटा बेटा था, वह कोई काम-धंधा नहीं करता था, वह निठल्ला था और दिन भर घर में ही रहता था। वह स्वभाव से अत्यंत भोला-भाला था, उसके मन में कोई छल-कपट नहीं था और वह किसी भी प्रकार के प्रपंच से दूर रहता था ।

बुढ़िया माता का व्यवहार अपने पुत्रों के प्रति अत्यंत भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण था। बुढ़िया माता प्रतिदिन अपने छहों कमाने वाले बेटों के लिए रसोई में अत्यंत स्वादिष्ट भोजन बनाती, उन्हें बड़े आदर-सत्कार के साथ सुंदर आसनों पर बिठाती और उत्तम भोजन कराती। परंतु जब वे छहों भाई भोजन करके उठ जाते, तो उनकी थालियों में जो कुछ भी जूठन (बचा हुआ झूठा भोजन) रह जाती, बुढ़िया माता उस जूठन को एकत्र करती और ले जाकर अपने सातवें तथा निठल्ले बेटे को परोस देती थी ।

सातवां बेटा अत्यंत सीधा और सरल होने के कारण माता के इस कृत्य पर कभी कोई विचार नहीं करता था। वह सोचता था कि माता उसे प्रेम से भोजन दे रही है, और जो कुछ रुखा-सूखा या जूठा उसे मिलता, उसे वह माता का आशीर्वाद समझकर खा लेता था。

उस सातवें बेटे की पत्नी (बुढ़िया की सबसे छोटी बहू) अत्यंत संस्कारी, पतिव्रता, धर्मपरायण और गुणवान स्त्री थी। वह प्रतिदिन रसोई में यह सब अन्यायपूर्ण दृश्य देखती थी। उसका हृदय अपने पति के इस घोर तिरस्कार और अपमान पर छलनी हो जाता था, परंतु मर्यादावश वह चुप रहती थी。

एक दिन छोटे बेटे ने अपनी पत्नी से अत्यंत गर्व के साथ कहा, "देखो भली मानस! मेरी माता का मुझ पर कितना अधिक प्रेम है। वह मेरा कितना ध्यान रखती है।" यह सुनकर पत्नी के भीतर का दुख छलक पड़ा और वह सत्य बोलते हुए कहने लगी, "क्यों नहीं! सबका जूठा बचा हुआ भोजन जो वह आपको खिलाती है, उससे बड़ा प्रेम और क्या होगा?" ।

पति ने आश्चर्यचकित होकर कहा, "ऐसा कदापि नहीं हो सकता। मेरी माता मेरे साथ ऐसा छल नहीं कर सकती। मैं जब तक अपनी आंखों से यह सब न देख लूं, तुम्हारी बातों पर कभी विश्वास नहीं कर सकता।" पत्नी ने भी शांत भाव से हंस कर कह दिया, "ठीक है स्वामी, जब अपनी आंखों से देख लोगे, तब तो मानोगे न? समय आने पर स्वयं परख लेना।" ।

सत्य का भान और माता का कपट

कुछ ही दिनों बाद घर में एक बड़ा त्योहार आया। उस दिन बुढ़िया माता ने घर में सात प्रकार के उत्तम व्यंजन और चूरमे के स्वादिष्ट लड्डू बनाए। छोटे बेटे को अपनी पत्नी की बात परखनी थी और सत्य जानना था। अतः उसने सिरदर्द का बहाना किया और अपने सिर पर एक पतला सा वस्त्र (कपड़ा) ओढ़कर रसोईघर के एक कोने में सो गया। उस पतले कपड़े के आर-पार उसे सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा था ।

भोजन का समय होने पर छहों कमाने वाले भाई रसोईघर में भोजन करने के लिए आए। छोटे बेटे ने कपड़े के भीतर से देखा कि माता ने उनके लिए अत्यंत सुंदर और स्वच्छ आसन बिछाए हैं। नाना प्रकार की रसोई और स्वादिष्ट व्यंजन उनके समक्ष परोसे गए और माता ने बड़े ही मनुहार, आग्रह और प्रेम के साथ उन छहों पुत्रों को जिमाया (भोजन कराया)।

छोटा बेटा यह सब देखता रहा। जब छहों भाई भोजन करके और पूर्ण रूप से तृप्त होकर वहां से उठ गए, तब बुढ़िया माता ने उनकी जूठी थालियों में बचे हुए अन्न और चूरमे के टुकड़ों को अपने हाथों से उठाया और उन सभी जूठे टुकड़ों को मिलाकर एक लड्डू बना लिया। जूठन साफ करने के बाद बुढ़िया मां ने पुकारा, "बेटा! छहों भाई भोजन कर गए हैं। अब तू ही बाकी है, उठ तू कब खाएगा?" ।

माता का यह कपट और अपनी पत्नी की बात को सत्य सिद्ध होते अपनी आंखों से देखकर छोटे बेटे का हृदय विदीर्ण हो गया। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वह तुरंत उठा और व्यथित स्वर में कहने लगा, "मां! मुझे अब यह भोजन नहीं करना है। मेरा सारा भ्रम आज टूट गया है। अब मैं यहां नहीं रहूंगा, मैं परदेस जा रहा हूं।" माता ने निष्ठुरता से कहा, "कल जाता हो तो आज ही चला जा।" वह बोला, "हां मां, मैं आज ही जा रहा हूं।" ।

पति का विदेश प्रस्थान और पति-पत्नी का मार्मिक संवाद

यह कहकर वह छोटा बेटा बिना कुछ खाए-पिए घर से निकल गया। घर से बाहर निकलते समय उसे अपनी पत्नी की याद आई। वह अपनी पत्नी से अंतिम भेंट करने के लिए गौशाला की ओर गया। वहां उसकी पत्नी गाय के गोबर से उपले (कंडे) थाप रही थी。

पति ने वहां जाकर अत्यंत भावुक होकर पारंपरिक वचनों में अपनी पत्नी से कहा:

"हम जावे परदेस, आवेंगे कछु काल।
तुम रहियो संतोष से, धर्म आपनो पाल॥"

पत्नी भी अत्यंत धैर्यवान और धर्मपरायण थी, उसने अपने पति को साहस बंधाते हुए और अपना दुख छिपाते हुए उत्तर दिया:

"जाओ पिया आनंद से, हमारो सोच हटाय।
राम भरोसे हम रहें, ईश वरत हैं सहाय॥
दो निशानी आपनी, देख धरूं मैं धीर।
सुधि मति हमारी बिसारियो, रखियो मन गंभीर॥"

पत्नी के यह वचन सुनकर पति ने कहा, "मेरे पास तो कुछ अधिक नहीं है, यह मेरे हाथ की अंगूठी है, सो तू इसे निशानी के रूप में अपने पास रख ले और अपनी कोई निशानी मुझे दे दे, ताकि परदेस में मुझे तुम्हारी याद रहे।"

पत्नी की आंखों में आंसू भर आए। वह अश्रुपूर्ण नेत्रों से बोली, "मेरे पास आपको देने के लिए क्या है स्वामी? मेरे ये हाथ तो गोबर से सने हुए हैं। यही मेरी निशानी है।" यह कहकर उसने अपने गोबर से सने हुए हाथ की थाप (छाप) अपने पति की पीठ पर मार दी । पति उसी गोबर की थाप को अपनी पत्नी की पवित्र स्मृति मानकर भारी मन से वहां से चल दिया。

पति की परदेस में सफलता और भारी धनार्जन

चलते-चलते वह छोटा बेटा एक अत्यंत दूर देश में जा पहुंचा। वहां बाजार में एक बड़े साहूकार की दुकान थी। वह साहूकार के पास गया और नम्रतापूर्वक कहने लगा, "भाई! मुझे अपनी दुकान पर नौकरी पर रख लो।" साहूकार को उस समय किसी सेवक की आवश्यकता थी। उसने लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, "ठीक है, रह जा।" लड़के ने पूछा, "मुझे तनख्वाह (वेतन) क्या दोगे?" साहूकार ने उत्तर दिया, "काम देखकर दाम मिलेंगे।" ।

लड़के को नौकरी मिल गई। वह अत्यंत परिश्रमी था और सुबह सात बजे से रात के दस बजे तक बिना रुके काम करता था। उसकी ईमानदारी और कुशाग्र बुद्धि के कारण कुछ ही दिनों में वह दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब और ग्राहकों को माल बेचने का संपूर्ण कार्य स्वयं करने लगा। साहूकार के पास सात-आठ अन्य नौकर भी थे, वे सब उस लड़के की लगन और प्रगति देखकर चक्कर खाने लगे और सोचने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया है ।

सेठ ने भी उस लड़के की सत्यनिष्ठा और कार्यकुशलता देखी। सेठ उससे इतना अधिक प्रभावित हुआ कि केवल तीन महीने के भीतर ही उसने उस लड़के को अपने व्यापार में आधे मुनाफे का हिस्सेदार (Partner) बना लिया। कुछ ही वर्षों के निरंतर परिश्रम से वह लड़का उस नगर का एक नामी और अत्यंत धनवान सेठ बन गया और वृद्ध साहूकार अपना सारा कारोबार उस पर छोड़कर स्वयं निश्चिंत होकर चला गया ।

सास-ससुर एवं परिवार का अत्याचार और पत्नी का घोर संघर्ष

इधर परदेस में पति नाम और धन कमा रहा था, परंतु घर पर उसकी पत्नी पर क्या बीती, यह अत्यंत दारुण कथा है। पति के घर से जाते ही सास और ससुर उसे घोर दुख और यातनाएं देने लगे। घर की जेठानियां और सास मिलकर सारी गृहस्थी का कठोर से कठोर काम उस अकेली बहू से करवातीं। उसे दिन भर घर के काम में जोता जाता, चक्की पिसवाई जाती और उसके बाद सूखी लकड़ियां बीनने के लिए भयानक जंगल में भेज दिया जाता ।

उसके खाने-पीने की व्यवस्था इतनी दयनीय कर दी गई थी कि घर के गेहूं के आटे को छानने के बाद जो भूसी (छिलके) निकलती थी, उसकी सूखी और कंटीली रोटी बनाकर उस बहू के लिए रख दी जाती थी। पानी पीने के लिए उसे कोई स्वच्छ बर्तन तक नहीं दिया गया था, बल्कि एक फूटे हुए नारियल की खोपड़ी (नारेल) दे दी गई थी, जिसमें वह पानी पीती थी। इस प्रकार अत्यंत घोर कष्ट, अपमान और भूख-प्यास सहते हुए उस पतिव्रता स्त्री के दिन व्यतीत हो रहे थे ।

संतोषी माँ व्रत का संकल्प और व्रत-विधान श्रवण

एक दिन की बात है, वह उपेक्षित और दुखियारी बहू रोजाना की तरह जंगल में सूखी लकड़ियां बीनने जा रही थी। रास्ते में चलते-चलते उसने देखा कि एक मंदिर के समीप बहुत सी स्त्रियां एकत्र हैं और वे सभी पूरी श्रद्धा के साथ किसी माता का व्रत और पूजन कर रही हैं। बहू वहां रुक गई और उन स्त्रियों के अनुष्ठान को ध्यान से देखने लगी ।

उसने वहां खड़ी होकर कथा सुनी और अत्यंत विनीत भाव से उन स्त्रियों से पूछा, "हे बहनों! आप सब यह किस माता का व्रत कर रही हैं? इस व्रत को करने से किस फल की प्राप्ति होती है? और इस व्रत को करने के क्या नियम और विधान हैं? यदि आप मुझे इस व्रत का संपूर्ण विधान बता देंगी, तो मैं आपकी अत्यंत आभारी रहूंगी" ।

उनमें से एक वयोवृद्ध और धर्मपरायण स्त्री ने उत्तर दिया, "सुनो बहन! यह संतोषी माता का व्रत है। माता संतोषी परम दयालु हैं। इस व्रत को करने से घर की सारी दरिद्रता और क्लेश का नाश होता है। घर में धन-संपत्ति और सुख-समृद्धि का वास होता है। जो स्त्री इस व्रत को करती है, उसके पति घर लौट आते हैं, जो कुंवारी कन्याएं करती हैं उन्हें योग्य वर मिलता है, और जिनके संतान नहीं होती, माता की कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। हर प्रकार की मनोकामना माता पूर्ण करती हैं" ।

व्रत का विधान बताते हुए उस स्त्री ने कहा, "इस व्रत को लगातार सोलह शुक्रवार तक करना चाहिए। शुक्रवार के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर एक कलश की स्थापना करनी चाहिए। कलश के ऊपर एक पात्र में सवा रुपए (या अपनी श्रद्धानुसार) का गुड़ और भुना हुआ चना रखना चाहिए। फिर संतोषी माता की पूजा और आरती करनी चाहिए और यह कथा सुननी चाहिए। कथा सुनते समय हाथों में गुड़ और चना अवश्य रखना चाहिए।"

स्त्री ने आगे अत्यंत कठोर स्वर में चेतावनी देते हुए कहा, "इस व्रत का सबसे कठोर और अनिवार्य नियम यह है कि व्रत करने वाले को और उसके परिवार को उस दिन किसी भी प्रकार की खट्टी वस्तु (जैसे इमली, नींबू, टमाटर, दही आदि) न तो खानी चाहिए और न ही किसी खट्टी वस्तु का स्पर्श करना चाहिए। सोलह शुक्रवार पूरे होने पर व्रत का उद्यापन करना चाहिए, जिसमें आठ बालकों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा (नकद धन नहीं, बल्कि कोई वस्तु या फल) देनी चाहिए और इस दिन भी खटाई का सर्वथा निषेध रखना चाहिए" ।

यह संपूर्ण विधान सुनकर उस निर्धन बहू के हृदय में आशा की एक नई किरण जाग उठी। उसने उसी क्षण संतोषी माता के व्रत का संकल्प ले लिया। उस दिन उसने जंगल से जो लकड़ियां काटी थीं, उन्हें बाजार में जाकर बेच दिया। उन लकड़ियों को बेचने से उसे जो थोड़े से पैसे मिले, उनसे उसने श्रद्धानुसार गुड़ और चना खरीदा। वह मंदिर में गई, वहां जाकर संतोषी माता की मूर्ति के समक्ष बैठकर उसने माता की कथा सुनी और अपना पहला शुक्रवार का व्रत पूर्ण किया ।

संतोषी माँ की कृपा और पति का स्वप्न

बहू ने अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ व्रत आरंभ कर दिया। माता संतोषी अपने भक्तों की सच्ची पुकार तुरंत सुनती हैं। जैसे ही बहू ने व्रत आरंभ किया, माता संतोषी की कृपा का प्रभाव उस दूर देश में बैठे उसके पति पर होने लगा。

एक रात माता संतोषी ने एक वृद्ध स्त्री का रूप धारण कर उस सेठ (पति) के स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "अरे मूर्ख! तू यहां परदेस में अपार धन कमा कर बैठा है, परंतु तुझे अपनी उस पत्नी की कोई सुध नहीं है, जो तेरे पीछे घोर कष्ट सह रही है। उसे तेरी याद सता रही है और वह दर-दर की ठोकरें खा रही है।" स्वप्न में पति ने हाथ जोड़कर कहा, "हे माता! मैं क्या करूं? मेरा व्यापार इतना फैल गया है कि लेन-देन का हिसाब किए बिना मैं यहां से प्रस्थान नहीं कर सकता।" माता ने कृपा करते हुए कहा, "तू कल सुबह स्नान कर, अपनी दुकान पर जा और सारा लेन-देन समेट कर दुकान बंद कर दे। मेरी कृपा से तेरा सारा हिसाब-किताब चुकता हो जाएगा और तू बहुत शीघ्र अपने घर पहुंच जाएगा।" ।

पति का पुनरागमन, सत्य का उद्घाटन और सुख-समृद्धि

प्रातः काल उठकर पति ने माता के आदेशानुसार सब काम समेटा। माता की कृपा से उसका सारा धन और व्यापार का हिसाब तुरंत सुलझ गया। उसने अपनी पत्नी के लिए अत्यंत सुंदर आभूषण, वस्त्र और घर वालों के लिए अपार धन-संपत्ति बांधी और अपने नगर की ओर प्रस्थान कर दिया。

इधर, बहू प्रतिदिन की भांति जंगल से लकड़ियां बीनकर लौट रही थी। तभी उसने देखा कि गांव के बाहर एक अत्यंत धनी सेठ आ रहा है। जब वह समीप आया तो उसने पहचान लिया कि वे कोई और नहीं, उसके अपने पति हैं। पति ने भी अपनी पत्नी को देखा। पत्नी की दयनीय अवस्था देखकर उसका हृदय कांप उठा। उसकी पत्नी के सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठर था, उसके वस्त्र फटे और मैले थे, उसके हाथों में भूसी की सूखी रोटी और पानी पीने के लिए नारियल की फूटी खोपड़ी थी。

पति तुरंत अपनी पत्नी को साथ लेकर घर पहुंचा। उसने घर के आंगन में अपना सारा धन, स्वर्ण और आभूषणों की गठरी रख दी। यह सब देखकर सास और जेठानियों की आंखें फटी रह गईं। सास ने अपना पुराना व्यवहार छिपाते हुए और झूठा प्रेम दिखाते हुए कहा, "बेटा! तूने इतना धन कमाया है, इसे मैं कहां रखूं?"

बेटे ने व्यंग्य करते हुए कहा, "मां! यह सारा धन उसी नारियल की खोपड़ी में रख दो, जिसमें तुम मेरी पत्नी को पानी पीने के लिए देती थीं। और इन आभूषणों को उस भूसी की रोटी में लपेट कर रख दो, जो तुम उसे खाने के लिए देती थीं।"

सास और जेठानियां समझ गईं कि उनके पापों का घड़ा फूट चुका है और उनका सारा भेद खुल गया है। वे लज्जित होकर सिर झुका कर खड़ी रह गईं। पति ने उस घर में रहना उचित नहीं समझा और अपनी पत्नी के लिए नगर में एक अलग, अत्यंत भव्य और सुंदर महल का निर्माण करवाया। अब वह उपेक्षित बहू एक रानी के समान सुखपूर्वक अपने महल में रहने लगी। यह सब माता संतोषी के व्रत और उनके आशीर्वाद का ही प्रताप था ।

उद्यापन का संकल्प और खट्टा भोजन निषेध का प्रसंग

दिन सुखपूर्वक बीत रहे थे। पत्नी का सोलहवां शुक्रवार निकट आ गया। उसने अपने पति से कहा, "हे स्वामी! मेरे सोलह शुक्रवार के व्रत पूर्ण हो गए हैं। मेरी इच्छा है कि मैं माता संतोषी के व्रत का पारंपरिक उद्यापन (Closing ritual) करूं।"

पति ने सहर्ष आज्ञा देते हुए कहा, "यह तो अत्यंत शुभ कार्य है। तुम जैसी तुम्हारी श्रद्धा हो, वैसा भव्य उद्यापन करो।"

उद्यापन के नियमानुसार आठ बालकों को भोजन कराना आवश्यक था। बहू ने सोचा कि बाहर के बालकों को बुलाने से अच्छा है कि मैं अपने ही जेठों के पुत्रों (भतीजों) को भोजन के लिए आमंत्रित करूं, जिससे पारिवारिक मतभेद भी मिट जाएं। उसने अपनी जेठानियों के घर जाकर उनके पुत्रों को भोजन का निमंत्रण दिया ।

देवरानी/ननद/बालकों द्वारा खट्टा खिलाने की घटना

परंतु जेठानियों के मन में अभी भी ईर्ष्या और द्वेष की अग्नि धधक रही थी। जब उन्होंने सुना कि यह उनके घर में माता संतोषी का उद्यापन कर रही है, तो उन्होंने एक कुटिल षड्यंत्र रचा। उन्होंने अपने सभी बच्चों को घर में बुलाकर सिखा-पढ़ा दिया कि "जब तुम्हारी चाची तुम्हें भोजन कराए, तो तुम सब भोजन करने के पश्चात् उससे खट्टी चीजें (जैसे खटाई, इमली) खाने की जिद करना और बिना खटाई खाए वहां से मत लौटना" ।

बच्चे अपनी माताओं की सिखाई हुई बातों के अनुसार अपनी चाची के महल में गए। बहू ने अत्यंत प्रेम से उन्हें नाना प्रकार के मीठे और सात्विक व्यंजन खिलाए। जब भोजन समाप्त हो गया और बहू उन्हें दक्षिणा देकर विदा करने लगी, तो बच्चे अचानक मचल गए और जिद करने लगे, "चाची! हमें मीठा भोजन नहीं चाहिए, हमें तो खटाई खानी है, इमली खानी है। हमें खट्टी चीजें दो।" ।

बहू ने बहुत घबराकर कहा, "अरे बच्चों! आज मेरे घर संतोषी माता के व्रत का उद्यापन है। आज के दिन खटाई खाना या छूना महापाप है। तुम ऐसा मत कहो। तुम चाहो तो इसके बदले मुझसे धन ले लो।" बच्चे तो अपनी माताओं द्वारा सिखाए गए थे, वे नहीं माने। उन्होंने चाची से पैसे ले लिए और उन पैसों से बाजार जाकर इमली और अन्य खट्टी चीजें खरीद कर खा लीं ।

चूंकि वह धन उद्यापन करने वाली बहू का था और उसी के धन से खटाई खरीदी गई थी, अतः व्रत का सबसे बड़ा और कठोर नियम—खटाई का निषेध—भंग हो गया。

माता का कोप और संकट उत्पन्न होना

नियम भंग होते ही संतोषी माता अत्यंत कुपित हो गईं। माता के कोप का परिणाम तुरंत ही सामने आ गया। उसी समय राजा के सैनिक उस भव्य महल में आए और बिना कोई कारण बताए बहू के पति (सेठ) को रस्सियों से बांधकर पकड़ ले गए। राजदरबार में उस पर झूठे आरोप लग गए और राजा ने उसे कारागार (जेल) में डाल दिया । यह देखकर जेठानियां ताने मारने लगीं कि यह अवश्य लूट का धन लाया होगा, अब जीवन भर जेल की चक्की पीसेगा。

पुनः श्रद्धा से व्रत-पालन और क्षमा याचना

बहू अत्यंत विलाप करने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक यह सब क्या हो गया। वह रोती-बिलखती हुई उसी मंदिर में भागी जहां उसने पहली बार माता संतोषी के व्रत का संकल्प लिया था। उसने माता की मूर्ति के समक्ष अपना सिर पटक-पटक कर रोना शुरू कर दिया और विलाप करते हुए बोली, "हे माता! मुझसे ऐसा कौन सा घोर अपराध हो गया है कि आपने मेरे पति को मुझसे छीन लिया और मेरे सुहाग पर इतना बड़ा संकट ला खड़ा किया?" ।

तभी माता संतोषी ने आकाशवाणी (या स्वप्न) के माध्यम से कहा, "पुत्री! तूने मेरे उद्यापन में मेरे सबसे कठोर नियम का उल्लंघन किया है। तेरे ही दिए गए धन से उन बालकों ने खटाई खरीद कर खाई है। इसी कारण मेरा व्रत भंग हुआ और तुझ पर यह विपत्ति आई है।" बहू ने हाथ जोड़कर और रोते हुए क्षमा याचना की, "हे जगदम्बा! हे करुणामयी माता! मैं अज्ञानी हूं, मुझे बालकों के इस छल का भान नहीं था। मैं आपके चरणों में गिरकर अपने अपराध की क्षमा मांगती हूं। कृपा करके मेरे पति को मुक्त कर दीजिए। मैं अगले शुक्रवार को पुनः पूरे विधि-विधान से आपके व्रत का उद्यापन करूंगी।" ।

माता की कृपा से संकट-निवारण

भक्त की सच्ची पुकार सुनकर माता का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने उसे क्षमा कर दिया। माता की कृपा होते ही राजा के दरबार में सच्चाई सामने आ गई। माता संतोषी ने राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि "इस सेठ को तुरंत मुक्त कर दो, अन्यथा तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा" । राजा ने भयभीत होकर प्रातः काल ही सेठ को ससम्मान कारागार से मुक्त कर दिया और उसे अपार धन-संपत्ति देकर वापस भेज दिया。

माता का भयानक स्वरूप और अंतिम परीक्षा

अगले शुक्रवार को बहू ने पुनः माता के व्रत का उद्यापन किया। इस बार उसने जेठानियों के बच्चों को नहीं बुलाया, बल्कि नगर के योग्य ब्राह्मण बालकों को बुलाकर उन्हें श्रद्धानुसार भोजन कराया और दक्षिणा में फल आदि दिए। इस बार खटाई का लेशमात्र भी प्रयोग नहीं हुआ ।

उद्यापन सफलता पूर्वक संपन्न होने के पश्चात्, माता संतोषी ने अपने भक्तों और उन कुटिल ससुराल वालों की अंतिम परीक्षा लेने का निश्चय किया। माता संतोषी ने एक अत्यंत भयानक और वीभत्स रूप धारण किया। उनके मुख और होंठों पर गुड़ और चना सना हुआ था, उनके चेहरे पर अनगिनत मक्खियां भिनभिना रही थीं। देखने में वे अत्यंत दरिद्र और डरावनी प्रतीत हो रही थीं। इसी भयानक वेश में माता उस सेठ (पति) के पुराने घर की देहरी (चौखट) पर आकर खड़ी हो गईं ।

जैसे ही माता ने देहरी पर अपना पैर रखा, सास और जेठानियां उस भयानक रूप को देखकर भय से चीख उठीं। सास चिल्लाने लगी, "देखो रे! कोई चुड़ैल या डाकिन आ रही है! लड़कों, इसे भगाओ, नहीं तो यह किसी को खा जाएगी!" वे सब मिलकर दरवाजे और खिड़कियां बंद करने लगे और माता को अपशब्द कहने लगे ।

परंतु वह उपेक्षित बहू, जो माता की सच्ची भक्त थी, रोशनदान से यह सब देख रही थी। वह अपनी माता के स्वरूप को पहचान गई। वह प्रसन्नता से लगभग पागल होकर दौड़ती हुई आई और चिल्लाने लगी, "अरे रुको! आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं!" उसने अपने छोटे बच्चे को दूध पीने से हटाया और भाग कर दरवाजा खोल दिया। सास का क्रोध फूट पड़ा, उसने बच्चे को झिड़कते हुए कहा, "कैसी उतावली हुई है जो बच्चे को पटक कर एक चुड़ैल के पास जा रही है?" ।

बहू ने किसी की नहीं सुनी। उसने झट से घर के सारे किवाड़ (दरवाजे) खोल दिए और माता के चरणों में गिर पड़ी। वह बोली, "मां जी! मैं जिनका व्रत करती हूं, यह वही मेरी संतोषी माता हैं।" इतना कहते ही माता संतोषी अपने वास्तविक, अत्यंत तेजोमय और कल्याणकारी स्वरूप में प्रकट हो गईं। माता के प्रताप और आशीर्वाद से पूरे महल में जहां देखो वहां लड़के ही लड़के (पुत्र) और बालकों की किलकारियां गूंज उठीं, जो समृद्धि और वंश वृद्धि का प्रतीक था ।

यह अद्भुत चमत्कार देखकर सास, ससुर, जेठानियां और उनके पुत्र भय और पश्चाताप से कांपने लगे। उन्हें अपने कुकृत्यों, बहू पर किए गए अत्याचारों और माता के स्वरूप को न पहचानने का घोर पछतावा हुआ。


तृतीय संस्करण: राजा, जंवाई और रानी चंपा की कथा (लोक-प्रचलित लघु संस्करण)

कुछ विशेष लोक-परंपराओं और क्षेत्रीय व्रत-कथाओं में संतोषी माता की महिमा को दर्शाने वाला एक अन्य लघु प्रसंग भी वाचित किया जाता है। यह कथा राजा और उसके जंवाई (दामाद) से संबंधित है ।

एक बार एक राजा और उसका जंवाई किसी कारणवश माता संतोषी के कोपभाजन बन गए और उन्हें घोर कष्ट झेलने पड़े। जब राजा को अपनी भूल का आभास हुआ, तो उसने माता की आराधना की। माता संतोषी उस राजा के स्वप्न में आईं और बोलीं, "अरे राजा! उठ और अपने राज्य वापस जा। तेरा जंवाई और तू मेरे प्रकोप को झेल रहे थे, परंतु अब मैंने तुम्हें क्षमा किया। अब तू अपने राज्य जा और मेरा एक भव्य मंदिर बनवा।" ।

दूसरे दिन प्रातः काल राजा और उसका जंवाई उठे। उन्होंने सभी साधु-संतों का शुक्रिया किया और उन्हें प्रणाम कर अपने राज्य की ओर लौट गए। राज्य में पहुंचकर राजा ने पूरे राज्य को संतोषी माता की अपार महिमा बताई और माता के आदेशानुसार संतोषी माता का एक भव्य मंदिर बनवाया。

राजा की पत्नी, रानी मां ने अपनी पुत्री 'चंपा' के साथ मिलकर अत्यंत धूमधाम से और पूरे विधि-विधान के साथ शुक्रवार के व्रत का उद्यापन किया। माता संतोषी की कृपा से चंपा को एक बहुत सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ और महल में वापस खुशियां छा गईं। इस प्रकार माता ने उन पर भी अपनी कृपा दृष्टि की ।


3. पारंपरिक उपसंहार एवं फल-श्रुति

जब सास, ससुर और जेठानियों को अपनी भूल का पूर्ण अहसास हुआ, तो वे सभी दौड़कर माता संतोषी के चरणों में गिर पड़े। पारंपरिक व्रत-कथाओं के अंत में उनके द्वारा की गई क्षमा-याचना और माता का फल-वचन इसी प्रकार ज्यों-का-त्यों पूर्ण रूप से पढ़ा जाता है:

सबने माता जी के चरण पकड़ लिए और बारंबार विनती कर रोते हुए कहने लगे— "हे माता! हम मूर्ख हैं। हम अज्ञानी हैं और बड़े पापी हैं। हे जगदम्बा, आपके व्रत की विधि हम नहीं जानते थे। आपका व्रत भंग कर और आपकी निंदा कर हमने बहुत बड़ा अपराध किया है। हे माता! आप परम दयालु हैं, कृपा करके आप हमारा अपराध क्षमा करो।"

इस प्रकार बारंबार अनुनय-विनय और रुदन को सुनकर दयामयी संतोषी माता अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने उन सभी अज्ञानियों को क्षमा कर दिया。

कथा के अंत में जो वयोवृद्ध महिला या कथावाचक इस कथा को सुनाते हैं, वे पारंपरिक रूप से यह फल-श्रुति (कथा सुनने का फल) उच्चारित करते हैं, जिसे सभी उपस्थित श्रद्धालु हाथ जोड़कर सुनते हैं:

"हे संतोषी माता! जिस प्रकार आपने उस निर्धन और उपेक्षित बहू पर प्रसन्न होकर उसे सुख-सौभाग्य, धन-धान्य और सुहाग का फल दिया, वैसा ही फल माता सबको दें। जो कोई इस कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़े, जो कोई इस कथा को सुने, और जो कोई कथा सुनते समय 'हां' या 'जय' की हुंकार भरे, माता उन सभी का मनोरथ पूर्ण करें। उनके घर से दरिद्रता का नाश हो और सदा सुख-शांति का वास हो।"

इसके पश्चात् उपस्थित सभी भक्त उच्च स्वर में जयघोष करते हैं: "बोलिए संतोषी माता की जय!"

(कथा समाप्ति के उपरांत हाथों में रखा हुआ गुड़ और चना माता की मूर्ति या चित्र के समक्ष अर्पित कर दिया जाता है और बचा हुआ प्रसाद वहां उपस्थित सभी भक्तों में और गौमाता को वितरित कर दिया जाता है।)


4. पारंपरिक संतोषी माता आरती एवं चालीसा

व्रत-पुस्तिकाओं में मुख्य कथा के पश्चात् माता की आरती और चालीसा का पाठ अनिवार्य रूप से किया जाता है। यही पारंपरिक पाठ व्रत को पूर्णता प्रदान करता है。

श्री संतोषी माता की आरती

"जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपत्ति दाता॥
सुंदर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्हो।
हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो॥
गेरू लाल छटा छबि, बदन कमल सोहे।
मंद हँसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चँवर ढुरे प्यारे।
धूप, दीप, मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥
गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।
संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥
जय शुक्रवार प्रिया मानत, आज दिवस सोही।
भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही॥
मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥
भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।
जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै॥
दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए।
बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥
ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥
शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे।
संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥
संतोषी माँ की आरती, जो कोई जन गावे।
रिद्धिसिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥"

श्री संतोषी माता चालीसा (मुख्य अंश)

"जय जय जय अंबे कल्याण, कृपा करो मोरी महारानी।
जो कोई पढ़े मातु चालीसा, ताके करह कृपा जगदीशा॥
नित प्रतिपाठ करे एक वारा, सुनर रहा ये तुम्हारा प्यारा।
नाम लेत व्याधा सब भागे, रोग दोष कबहु नाहीं लागे॥
संतोषी मां के सदा बंद हूं पग निश्वास।
पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरो भव त्रास॥"


"ध्यान धरत ही होत नर, दुःख सागर से पार।
भक्तन को सन्तोष दे, सन्तोषी तव नाम॥
कृपा करहु जगदम्ब अब, आया तेरे धाम।
शान्ति दायिनी रूप मनोरम..."

(इति श्री संतोषी माता संपूर्ण व्रत कथा)

टैग:#संतोषी माता व्रत कथा#santoshi mata vrat katha#संतोषी माता कथा हिंदी#संतोषी माता शुक्रवार कथा#santoshi mata katha hindi#संतोषी माता व्रत विधि#santoshi mata friday katha#संतोषी माता की कहानी#संतोषी माता पूजा कथा#संतोषी व्रत महात्म्य

📚 इसे भी पढ़ें

Katha

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा: संपूर्ण शास्त्रीय एवं पौराणिक प्रामाणिक पाठ

Katha

रथ सप्तमी (अचला सप्तमी / सूर्य जयंती) व्रत कथा: संपूर्ण प्रामाणिक पाठ

Katha

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा: संपूर्ण प्रामाणिक एवं पारंपरिक पाठ

Katha

करवा चौथ व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पौराणिक पाठ

Katha

अहोई अष्टमी व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पौराणिक पाठ

Katha

जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पाठ