विस्तृत उत्तर
मंदिर में भजन-कीर्तन का महत्त्व भागवत पुराण और नारद भक्ति सूत्र में विस्तार से वर्णित है।
शास्त्रीय आधार
भागवत पुराण (12.3.51-52): 'कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्।।' — कलियुग का एकमात्र गुण है: भगवान के कीर्तन से मुक्ति मिलती है।
नारद भक्ति सूत्र (36-37): 'गीयतां भगवान्...' — भगवान का गान करो। कीर्तन = नवधा भक्ति का एक अंग।
भजन गाने के पाँच कारण
1कलियुग में सर्वोच्च साधना
भागवत: कलियुग में ध्यान, यज्ञ, तपस्या कठिन हैं — कीर्तन सबसे सुलभ और सर्वाधिक फलदायक।
2नाद-शुद्धि
नाद बिंदु उपनिषद: भजन की ध्वनि-तरंगें मंदिर के वातावरण को शुद्ध करती हैं। सामूहिक कीर्तन की ऊर्जा अत्यधिक शक्तिशाली।
3मन-एकाग्रता
भजन सुनते-गाते हुए मन अपने आप भगवान में लीन होने लगता है — यह ध्यान का सरलतम रूप।
4सामूहिक भक्ति
भागवत: 'महाजनो येन गतः स पन्थाः।' — सामूहिक भजन में व्यक्तिगत साधना की सीमाएँ टूट जाती हैं।
5परंपरा-संरक्षण
भजनों में वेद, पुराण, संत-वाणी का सार सरल भाषा में — ज्ञान का जन-जन तक प्रसार।





