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मंदिर में किस दिशा में भगवान की मूर्ति होती है?

मूर्ति की दिशा: विष्णु — पूर्वमुखी (मानसार)। शिव — शिवलिंग पश्चिम, नंदी पूर्व (कामिकागम)। दुर्गा — उत्तरमुखी (मयमत)। गणेश — ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)।

संक्षिप्त उत्तर

मूर्ति की दिशा: विष्णु — पूर्वमुखी (मानसार)। शिव — शिवलिंग पश्चिम, नंदी पूर्व (कामिकागम)। दुर्गा — उत्तरमुखी (मयमत)। गणेश — ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)। दक्षिणामूर्ति — दक्षिणमुखी। गर्भगृह = मानव-हृदय का प्रतीक (अग्नि पुराण)।

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विस्तृत उत्तर

मंदिर में मूर्ति की दिशा का विधान आगम शास्त्रों और वास्तु शास्त्र में अत्यंत विस्तार से वर्णित है।

मूल नियम

आगम शास्त्र: मंदिर में भगवान की मूर्ति (विग्रह) का मुख सामान्यतः पूर्व या पश्चिम दिशा में होता है ताकि भक्त का मुख पूर्व या पश्चिम की ओर हो।

देवता-अनुसार दिशा-विधान

1विष्णु-मंदिर

मानसार (वास्तु शास्त्र): विष्णु का मुख पूर्व दिशा में। भक्त पश्चिम की ओर से प्रवेश करके पूर्व-मुखी देवता के दर्शन करें।

2शिव-मंदिर

आगम शास्त्र (कामिकागम): शिवलिंग की स्थापना गर्भगृह में। नंदी का मुख शिवलिंग की ओर (पश्चिम)। भक्त पूर्व से प्रवेश करके पश्चिम-मुखी शिवलिंग के दर्शन करें।

3दुर्गा/काली

मयमत: माँ दुर्गा का मुख प्रायः उत्तर दिशा में (उत्तर = कुबेर-दिशा = ऐश्वर्य)।

4गणेश

वास्तु शास्त्र: गणेश = द्वारपाल। मंदिर के द्वार पर उत्तर-पूर्व कोण (ईशान कोण) में।

5दक्षिणामूर्ति शिव

आगम शास्त्र: दक्षिणामूर्ति का मुख दक्षिण — दक्षिण = यम की दिशा = मृत्यु-भय-नाशक।

गर्भगृह का महत्त्व

अग्नि पुराण: मंदिर का गर्भगृह = जहाँ विग्रह स्थापित — यह मानव हृदय का प्रतीक है। मंदिर = बड़ा मानव-शरीर।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

मंदिर में किस दिशा में भगवान की मूर्ति होती है को संदर्भ सहित समझें

मंदिर में किस दिशा में भगवान की मूर्ति होती है का सबसे सीधा सार यह है: मूर्ति की दिशा: विष्णु — पूर्वमुखी (मानसार)। शिव — शिवलिंग पश्चिम, नंदी पूर्व (कामिकागम)। दुर्गा — उत्तरमुखी (मयमत)। गणेश — ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)। दक्षिणामूर्ति — दक्षिणमुखी। गर्भगृह =...

मंदिर जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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