विस्तृत उत्तर
मंदिर में मूर्ति की दिशा का विधान आगम शास्त्रों और वास्तु शास्त्र में अत्यंत विस्तार से वर्णित है।
मूल नियम
आगम शास्त्र: मंदिर में भगवान की मूर्ति (विग्रह) का मुख सामान्यतः पूर्व या पश्चिम दिशा में होता है ताकि भक्त का मुख पूर्व या पश्चिम की ओर हो।
देवता-अनुसार दिशा-विधान
1विष्णु-मंदिर
मानसार (वास्तु शास्त्र): विष्णु का मुख पूर्व दिशा में। भक्त पश्चिम की ओर से प्रवेश करके पूर्व-मुखी देवता के दर्शन करें।
2शिव-मंदिर
आगम शास्त्र (कामिकागम): शिवलिंग की स्थापना गर्भगृह में। नंदी का मुख शिवलिंग की ओर (पश्चिम)। भक्त पूर्व से प्रवेश करके पश्चिम-मुखी शिवलिंग के दर्शन करें।
3दुर्गा/काली
मयमत: माँ दुर्गा का मुख प्रायः उत्तर दिशा में (उत्तर = कुबेर-दिशा = ऐश्वर्य)।
4गणेश
वास्तु शास्त्र: गणेश = द्वारपाल। मंदिर के द्वार पर उत्तर-पूर्व कोण (ईशान कोण) में।
5दक्षिणामूर्ति शिव
आगम शास्त्र: दक्षिणामूर्ति का मुख दक्षिण — दक्षिण = यम की दिशा = मृत्यु-भय-नाशक।
गर्भगृह का महत्त्व
अग्नि पुराण: मंदिर का गर्भगृह = जहाँ विग्रह स्थापित — यह मानव हृदय का प्रतीक है। मंदिर = बड़ा मानव-शरीर।





