विस्तृत उत्तर
प्रसाद ग्रहण की सही विधि शास्त्रों में भाव और शारीरिक शुद्धि दोनों दृष्टि से वर्णित है।
प्रसाद ग्रहण की शास्त्र-सम्मत विधि
1दाहिने हाथ से ग्रहण
मनुस्मृति: प्रसाद सदा दाहिने हाथ (या दोनों हाथों) से ग्रहण करें। बाएँ हाथ से प्रसाद ग्रहण अशुभ माना जाता है।
2प्रसाद माथे पर लगाना
आगम शास्त्र: प्रसाद को पहले माथे पर लगाएँ (नेत्रों के ऊपर), फिर ग्रहण करें। यह देवता-कृपा को आज्ञाचक्र से ग्रहण करने की भावना से किया जाता है।
3भाव-पूर्वक ग्रहण
विष्णु पुराण: 'यः प्रसादं विना भावं खादति।' — बिना भाव के प्रसाद खाना = केवल भोजन। भाव के साथ = देवता-कृपा का ग्रहण। मन में 'भगवान का प्रसाद है' — यह भाव रखें।
4खड़े होकर या बैठकर
धर्मसिंधु: प्रसाद चलते-चलते न खाएँ। स्थिर खड़े या बैठकर ग्रहण करें।
5जूठा न करें
प्रसाद जूठा न करें, न पूजा-स्थल पर फेंकें। बचा हुआ प्रसाद किसी को दें या किसी पशु को खिलाएँ।
6चरणामृत
तीर्थ-जल (चरणामृत) हाथ पर लेकर सिर पर छिड़कें, फिर पियें।
विशेष: प्रसाद में दिए जाने वाले तुलसी-दल और भस्म को भी ग्रहण करें — ये औषधीय और आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से लाभकारी हैं।





