विस्तृत उत्तर
मंदिर में भजन सुनना एक गहरी आध्यात्मिक क्रिया है जिसके लाभ कई स्तरों पर होते हैं।
पहला लाभ है — चित्त शुद्धि। मंदिर का वातावरण पहले से ही पवित्र होता है — धूप, दीप, पुष्प और मंत्रों की ध्वनि से वहाँ की हवा आध्यात्मिक तरंगों से भरी होती है। इस वातावरण में भजन सुनने से मन तीव्र गति से शुद्ध होता है।
दूसरा लाभ है — श्रवण-भक्ति का पालन। नवधा भक्ति में श्रवण को प्रथम और सरलतम भक्ति माना गया है। मंदिर में बैठकर भजन सुनना इस श्रवण-भक्ति का सर्वोत्तम रूप है।
तीसरा लाभ है — सत्संग का फल। मंदिर में एकत्र सभी भक्त एक ही भाव से बैठे होते हैं — यह सामूहिक भाव व्यक्तिगत मन को भी उठाता है। 'संघे शक्ति: कलौ युगे' — समूह में अधिक शक्ति मिलती है।
चौथा लाभ है — देवता-चेतना से संपर्क। मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्ति और नित्य पूजा-अभिषेक से एक दिव्य चेतना वहाँ स्थायी रूप से विद्यमान होती है। भजन की ध्वनि उस चेतना को जागृत करती है और भक्त उससे जुड़ता है।
पाँचवाँ लाभ है — कर्म-क्षय। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि जहाँ हरि-नाम का संकीर्तन होता है, वहाँ की धरती भी पवित्र हो जाती है। मंदिर में भजन सुनने वाले के अनजाने पाप और कर्म-बाधाएं भी दूर होती हैं।





