विस्तृत उत्तर
नाम-संकीर्तन को कलियुग का सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है। इसके आध्यात्मिक लाभों का विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत, बृहन्नारदीय पुराण और विष्णुधर्मोत्तर में मिलता है।
श्रीमद्भागवत (12.3.51-52) का वचन — 'कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।।' — सतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में पूजा से जो फल मिलता था — वह कलियुग में केवल हरि के नाम-संकीर्तन से प्राप्त होता है।
बृहन्नारदीय पुराण का वचन — 'हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा।।' — कलियुग में केवल हरिनाम ही एकमात्र मार्ग है, अन्य कोई उपाय नहीं।
नाम-संकीर्तन के विशिष्ट आध्यात्मिक लाभ —
- 1चित्त-शुद्धि — नाम के कम्पन से हृदय पर जमे कर्म-संस्कारों की धूल साफ होती है।
- 1पाप-नाश — श्रीमद्भागवत (12.13.23) में कहा गया है — 'नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।'
- 1भक्ति-उदय — निरंतर नाम-संकीर्तन से हृदय में भगवत्-प्रेम जागृत होता है।
- 1मोक्ष का द्वार — नाम-संकीर्तन कर्म के बंधन काटता है और जीव को मुक्ति की ओर ले जाता है।
- 1देश-काल का बंधन नहीं — विष्णुधर्मोत्तर के अनुसार नाम-संकीर्तन में कोई नियम नहीं — जूठे मुँह, अशुद्ध अवस्था में भी किया जा सकता है।
- 1स्वयं के साथ श्रोताओं का उद्धार — ऊँचे स्वर से नाम लेने वाला स्वयं के साथ सुनने वालों को भी शुद्ध करता है।





