कर्म = विचार + वाणी + कर्म। कोई कर्म नष्ट नहीं होता। तीन प्रकार: संचित (पुराने कर्मों का भंडार), प्रारब्ध (इस जन्म का भोग/भाग्य), आगामी (वर्तमान कर्म — भविष्य बदलते हैं)। निष्काम कर्म = मुक्ति। ज्ञान
कर्म सिद्धांत: परिभाषा: 'कर्म' संस्कृत 'कृ' धातु से — अर्थात् करना। सनातन दर्शन में कर्म = विचार + वाणी + शरीर से किए गए समस्त कार्य।
*'जो जैसा बोता है, वैसा काटता है'* — यही कर्म सिद्धांत का सार है। हर कर्म का फल अवश्य मिलता है — कोई कर्म नष्ट नहीं होता।