मनुष्य 'कर्म योनि' में है — उसे विवेक और स्वतंत्र इच्छा से नए कर्म करने की शक्ति मिली है। इसीलिए वह अपने कर्मों का पूरा उत्तरदायी है और उसे उनका फल भोगना पड़ता है।
सनातन शास्त्रों में मनुष्य योनि को 'कर्म योनि' कहा गया है।
इसका अर्थ है कि मनुष्य ऐसा एकमात्र प्राणी है जो सोच-समझकर, विवेक का उपयोग करते हुए, स्वतंत्र रूप से नए कर्म कर सकता है।