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केवल मनुष्य को ही कर्मफल क्यों भोगना पड़ता है?

मनुष्य 'कर्म योनि' में है — उसे विवेक और स्वतंत्र इच्छा से नए कर्म करने की शक्ति मिली है।

संक्षिप्त उत्तर

मनुष्य 'कर्म योनि' में है — उसे विवेक और स्वतंत्र इच्छा से नए कर्म करने की शक्ति मिली है। इसीलिए वह अपने कर्मों का पूरा उत्तरदायी है और उसे उनका फल भोगना पड़ता है।

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विस्तृत उत्तर

सनातन शास्त्रों में मनुष्य योनि को 'कर्म योनि' कहा गया है। इसका अर्थ है कि मनुष्य ऐसा एकमात्र प्राणी है जो सोच-समझकर, विवेक का उपयोग करते हुए, स्वतंत्र रूप से नए कर्म कर सकता है। वह धर्म और अधर्म का भेद जानता है, फिर भी अपनी इच्छा से किसी भी मार्ग को चुन सकता है।

पशु-पक्षी या अन्य जीव 'भोग योनि' में हैं — वे केवल अपने पुराने कर्मों का फल भोग रहे हैं, प्रकृति के निर्देश पर चलते हैं और उनमें नया कर्म करने की वह विवेकशील स्वतंत्रता नहीं होती जो मनुष्य को मिली है। इसीलिए उन्हें यमलोक में उसी प्रकार उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता।

गरुड़ पुराण और मनुस्मृति में कहा गया है कि जो जानते हुए भी पाप करता है, उसे दंड मिलता है। मनुष्य को ज्ञान दिया गया है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी सबसे अधिक है। कठोपनिषद में यमराज स्वयं कहते हैं कि जीव अपने कर्मों और अंतिम विचारों के अनुसार अगला जन्म पाता है।

सारांशतः, मनुष्य को कर्मफल इसलिए भोगना पड़ता है क्योंकि उसे विवेक, विकल्प और स्वतंत्र इच्छा प्रदान की गई है — और जहाँ स्वतंत्रता है, वहाँ जिम्मेदारी और उसके परिणाम भी अनिवार्य हैं।

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