विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रत्येक पाप के लिए एक विशेष नरक निर्धारित है। यह कर्म-न्याय की सबसे ठोस अभिव्यक्ति है।
नरक और पाप का संयोजन — गरुड़ पुराण में — 'नरक में प्रत्येक पाप के लिए अलग-अलग दंड के स्थान और प्रकार बताए गए हैं, जैसे क्रोध, चोरी, झूठ, अन्याय आदि के लिए अलग-अलग यातनाएं।'
प्रमुख उदाहरण — झूठी गवाही → रौरव; हिंसा → कुंभीपाक; स्त्री-अपमान → शूकरमुख; छल-कपट → तमिश्रम; गुरु-धोखा → महापातक; परस्त्री-गमन → शाल्मली; धर्म-विरोध → विदीर्ण; समय बर्बाद → कालसूत्र; मित्र-द्रोह → असिपत्रवन।
गरुड़ पुराण का सिद्धांत — 'नरक में जो भी आत्मा जाती है, उसे उसके जीवन में किए गए पापों के अनुसार ही दंड मिलता है। यहाँ कोई भी दंड अनुचित नहीं होता।'
भागवत पुराण — 'जिस-जिस पाप से जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन योनियों में जीव जाते हैं' — प्रत्येक पाप का अपना विशेष परिणाम है।
संक्षेप — 21 घोर नरक और 84 लाख कुल नरक — प्रत्येक पाप के लिए अलग स्थान।





