बांसुरी=खाली बांस=अहंकार शून्य→ईश्वर दिव्य संगीत बजाते। छेद=कष्ट(कष्ट बिना संगीत नहीं)। कृष्ण होंठ=निकटतम। ध्वनि=ईश्वर पुकार(गोपियाँ दौड़ीं)। खाली हो जाओ=कृष्ण बजाएंगे।
बांसुरी (वेणु) = कृष्ण का सबसे प्रिय वाद्य — गहरा आध्यात्मिक प्रतीक: 1। बांसुरी = खाली बांस। भीतर से पूर्णतः खाली (शून्य) — अहंकार शून्य।
जब जीव अहंकार त्यागे = ईश्वर (कृष्ण) उसमें से दिव्य संगीत बजाते। बांसुरी में छेद = जीवन के कष्ट। कष्ट बिना = संगीत नहीं।