एकलव्य से शिक्षाएँ: भाव-शक्ति से गुरु को हृदय में स्थापित करें; सच्ची लगन किसी अवरोध से बड़ी है; गुरु के प्रति त्याग की पराकाष्ठा ही महानता है। साधना से उत्पन्न विद्या अमर होती है।
एकलव्य की कथा महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 131) में विस्तार से वर्णित है। एकलव्य राजा हिरण्यधनु के पुत्र और निषाद जाति के थे।
उनकी कथा गुरु-भक्ति, आत्मशक्ति, त्याग और अन्याय के बीच भी धर्म की राह पर चलने की अनूठी कहानी है।