विस्तृत उत्तर
एकलव्य की कथा महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 131) में विस्तार से वर्णित है। एकलव्य राजा हिरण्यधनु के पुत्र और निषाद जाति के थे। उनकी कथा गुरु-भक्ति, आत्मशक्ति, त्याग और अन्याय के बीच भी धर्म की राह पर चलने की अनूठी कहानी है।
कथा का सार — एकलव्य धनुर्विद्या सीखने की इच्छा से द्रोणाचार्य के आश्रम गए, किंतु द्रोणाचार्य ने राजकुमारों को शिक्षा देने का वचन लिया था, इसलिए उन्होंने मना कर दिया। निराश एकलव्य ने वन में जाकर द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसे ही गुरु मानकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगे। उनकी अपार लगन से वे इतने निपुण हो गए कि एक ही बार में कुत्ते के मुँह में सात बाण भर दिए — बिना उसे घायल किए।
जब द्रोणाचार्य को यह विद्या देखकर एकलव्य का गुरु कौन है — यह जानने की जिज्ञासा हुई, तो एकलव्य ने उन्हें ही अपना गुरु बताया। द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा माँग लिया। एकलव्य ने बिना एक पल की हिचकिचाहट के अंगूठा काटकर गुरुचरणों में अर्पित कर दिया।
इस कथा के प्रमुख संदेश:
गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा — एकलव्य ने भौतिक रूप में गुरु न पाते हुए भी उनकी मूर्ति में गुरु का भाव जागृत किया। यह भाव की शक्ति और गुरु-विश्वास का असाधारण उदाहरण है।
लगन और आत्म-अनुशासन — बिना किसी शिक्षक की प्रत्यक्ष उपस्थिति के, केवल साधना और लगन से एकलव्य ने अर्जुन के समतुल्य धनुर्विद्या प्राप्त की। शिक्षा — सच्ची लगन और अभ्यास किसी भी अवरोध से ऊपर उठ सकते हैं।
त्याग की पराकाष्ठा — अंगूठे का दान देकर एकलव्य ने यह सिद्ध किया कि गुरु-ऋण अमूल्य है। उनका यह त्याग उन्हें इतिहास में अमर कर गया।
न्याय और प्रश्न — इस कथा में यह प्रश्न भी है कि क्या द्रोणाचार्य का अंगूठा माँगना उचित था? इसका कोई सरल उत्तर नहीं — यह जीवन की जटिलता दिखाता है कि कभी-कभी श्रेष्ठ व्यक्ति भी अपनी प्रतिबद्धताओं के कारण अन्याय करते दिखते हैं।





