विस्तृत उत्तर
महाभारत के सभा पर्व में देवर्षि नारद द्वारा सुधर्मा सभा के वर्णन में इस सभा को 'काम-गामिनी' कहा गया है। 'काम-गामिनी' का शाब्दिक अर्थ है — 'इच्छा के अनुसार गमन करने वाली' या 'इच्छा से चलने वाली'। इसका तात्पर्य यह है कि यह राजसभा कोई पृथ्वी के भवनों के समान स्थिर संरचना नहीं है। यह एक ऐसी अलौकिक संरचना है जो इच्छा के अनुसार आकाश में तीव्र या मंद गति से विचरण कर सकती है। यह विशेषता इसे पृथ्वी की किसी भी भव्य इमारत से सर्वथा अलग और श्रेष्ठ बनाती है। इस सभा की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके भीतर प्रवेश करते ही प्राणी के भीतर से शोक, जरा, थकान, मानसिक चिंता और भय का पूर्णतः नाश हो जाता है। यह काम-गामिनी गुण देव-विमानों के समान है जो इच्छा से आकाश में विचरण करते हैं।
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