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भागवत में ध्रुव की कथा से क्या प्रेरणा मिलती है?

ध्रुव से प्रेरणा: पाँच वर्षीय बालक ने अटूट संकल्प से भगवान विष्णु को प्राप्त किया। भक्ति में डूबने पर सांसारिक इच्छाएँ विलीन हो जाती हैं।

संक्षिप्त उत्तर

ध्रुव से प्रेरणा: पाँच वर्षीय बालक ने अटूट संकल्प से भगवान विष्णु को प्राप्त किया। भक्ति में डूबने पर सांसारिक इच्छाएँ विलीन हो जाती हैं। माँ का मार्गदर्शन और दृढ़ संकल्प ही सच्ची शक्ति है।

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विस्तृत उत्तर

ध्रुव की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में वर्णित है। यह एक पाँच वर्षीय बालक की कथा है जिसने अपनी माँ के अपमान का बदला लेने की जिद में वह पा लिया जो बड़े-बड़े ऋषि भी नहीं पा सके।

कथा का सार — राजा उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। ध्रुव सुनीति के पुत्र थे। एक बार ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठना चाहते थे, किंतु सौतेली माँ सुरुचि ने उन्हें अपमानित किया और कहा — 'यदि राजा की गोद में बैठना है तो पहले भगवान विष्णु की तपस्या करो।' ध्रुव रोते हुए अपनी माँ सुनीति के पास गए। सुनीति ने उन्हें भगवान विष्णु की भक्ति का मार्ग बताया।

पाँच साल का वह बालक घर छोड़कर मधुवन वन में चला गया। मार्ग में नारद जी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, किंतु ध्रुव का संकल्प अडिग था। नारद जी ने उन्हें 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र दिया और तपस्या का विधान बताया। ध्रुव ने घोर तपस्या की — पहले फल खाए, फिर पत्ते, फिर केवल पानी, फिर वायु पर जिए, अंत में श्वास भी रोककर खड़े हो गए। उनकी तपस्या से तीनों लोक काँप उठे।

भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए। ध्रुव ने जो माँगने आए थे वह तो भूल ही गए — और कहा — 'भगवान, आपके दर्शन के बाद कुछ माँगना शेष नहीं रहा।' भगवान ने उन्हें अटल पद (ध्रुव लोक) प्रदान किया — जो आकाश में ध्रुव तारे के रूप में सदा दीखता है।

इस कथा की प्रेरणाएँ:

संकल्प और दृढ़ता — पाँच साल का बालक जो एक बार ठान ले, उसे बड़े-बड़े भी नहीं डिगा सकते। शिक्षा — लक्ष्य तय करके उस पर डटे रहना ही सफलता का मूलमंत्र है।

भक्ति से मिलता है सर्वस्व — जो ध्रुव ने अपमान का बदला लेने गए थे, वे भगवान के दर्शन के बाद सब भूल गए। भक्ति उच्चतम अवस्था है जहाँ सांसारिक इच्छाएँ स्वतः विलीन हो जाती हैं।

माँ का मार्गदर्शन अमूल्य है — सुनीति ने क्रोध या कटुता के बजाय ध्रुव को सही राह दिखाई। शिक्षा — सच्चा मार्गदर्शन बालक को महान बना देता है।

ध्रुव तारा — ध्रुव का अटल पद आकाश में ध्रुव तारे के रूप में आज भी जीवित है — यह अटलता और संकल्प का प्रतीक है।

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