विस्तृत उत्तर
जब पूजा करने का मन ही न हो — यह भी एक आध्यात्मिक अवस्था है जिससे हर साधक गुजरता है। संत इसे 'भक्ति का सूखा' कहते हैं।
यह क्यों होता है — अत्यधिक थकान, मानसिक तनाव, सांसारिक निराशाएँ, जब प्रार्थनाएँ पूरी न हों, और कभी-कभी आध्यात्मिक शुष्कता का एक चरण — इन सब कारणों से।
क्या करें:
जबरदस्ती न करें, पर पूरी तरह छोड़ें भी नहीं — एक छोटा सा काम करें। केवल भगवान का नाम तीन बार लें, एक दीपक जलाएँ। 'कम पर कुछ' — यह रोज़ का नाता बनाए रखता है।
कारण खोजें — क्या बहुत थके हैं? क्या जीवन में कोई गहरी निराशा है? उस कारण को भगवान के सामने रखें — उनसे सीधे कहें 'आज मन नहीं है, पर आपके बिना भी नहीं रह सकता।'
सत्संग खोजें — किसी भक्त के साथ बैठें, भजन सुनें, किसी आश्रम जाएँ। दूसरों की भक्ति की ऊर्जा भीतर भाव जगाती है।
प्रकृति में जाएँ — मंदिर न जा पाएँ तो नदी, पहाड़, बगीचे में जाएँ — वहाँ भगवान सहज उपस्थित हैं।
संतों का वचन — संत तुकाराम कहते हैं — 'भजन करते करते भाव जागता है, भाव जागे बिना भजन शुरू नहीं होता' — यह चक्र है। पहला कदम आप उठाएँ, भाव भगवान देंगे।
याद रखें — भगवान आपको माफ करते हैं। वे माँ हैं — बच्चे के रूठने पर माँ का प्रेम कम नहीं होता।





