विस्तृत उत्तर
कर्ण महाभारत का सबसे जटिल और मार्मिक पात्र है। सूर्यपुत्र होते हुए भी 'सूतपुत्र' के कलंक से जीवन भर जूझने वाला, अपार दानी किंतु विपत्तियों से कभी मुक्त न होने वाला कर्ण — उनका जीवन अनेक शिक्षाओं का भंडार है।
दान ही सच्ची पहचान है — कर्ण को 'दानवीर' की उपाधि इसलिए मिली क्योंकि सूर्य-पूजा के समय जो भी माँगे, कभी खाली हाथ न लौटाते। यहाँ तक कि देवराज इंद्र ने छल से उनसे कवच-कुंडल माँग लिए — जो उनके शरीर का अभिन्न अंग थे — फिर भी कर्ण ने बिना हिचके दे दिए। शिक्षा — सच्चा दान वह है जो अहंकार और स्वार्थ से मुक्त हो।
कर्तव्य और मित्रता — जब कुंती ने यह बताया कि कर्ण पांडवों का बड़ा भाई है, तो कर्ण ने अर्जुन को छोड़कर बाकी चारों की रक्षा का वचन दिया — दुर्योधन के प्रति निष्ठा के साथ पांडवों के प्रति भ्रातृत्व का यह संतुलन उनकी महानता है। शिक्षा — जो मित्रता में सच्चे हों, वे जीवन में अमर हो जाते हैं।
परिस्थिति आपकी गरिमा नहीं छीन सकती — कर्ण को जन्म से माँ ने गंगा में बहा दिया, सारथी के पुत्र के रूप में पले-बढ़े, रंगभूमि में जाति-भेद के कारण अपमानित हुए, परशुराम से शाप मिला, इंद्र ने छल से कवच-कुंडल लिए — फिर भी उन्होंने कभी अपना धर्म नहीं छोड़ा। शिक्षा — परिस्थितियाँ कैसी भी हों, अपने आदर्शों को निभाना ही सच्ची वीरता है।
ज्ञान को झूठ से प्राप्त करने का दंड — कर्ण ने परशुराम के पास ब्राह्मण बताकर शिक्षा ग्रही। यह तथ्य उजागर होने पर परशुराम ने शाप दिया — 'जब तुम्हें मेरी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस समय यह विस्मरण हो जाएगी।' युद्धभूमि में रथ का पहिया धरती में धँसने पर यह शाप सिद्ध हुआ। शिक्षा — ज्ञान ईमानदारी से प्राप्त करें; छल से प्राप्त विद्या संकट में साथ नहीं देती।
संक्षेप में, कर्ण का जीवन यह बताता है कि जन्म, जाति या परिस्थिति से इंसान नहीं, उसके कर्म और चरित्र से पहचाना जाता है।





