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भागवत में प्रह्लाद की कथा से क्या संदेश मिलता है?

प्रह्लाद से शिक्षाएँ: ईश्वर सर्वत्र हैं; भक्ति सबसे बड़ा कवच है; सत्य के मार्ग पर अडिग रहें; निष्काम भक्ति में ईश्वर स्वयं रक्षक बनते हैं।

संक्षिप्त उत्तर

प्रह्लाद से शिक्षाएँ: ईश्वर सर्वत्र हैं; भक्ति सबसे बड़ा कवच है; सत्य के मार्ग पर अडिग रहें; निष्काम भक्ति में ईश्वर स्वयं रक्षक बनते हैं। सत्य की विजय अवश्य होती है।

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विस्तृत उत्तर

भक्त प्रह्लाद की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के सप्तम स्कंध में विस्तार से वर्णित है। यह कथा भक्ति की अजेय शक्ति और ईश्वर की रक्षाशीलता का सबसे प्रभावशाली उदाहरण है।

कथा का सार — हिरण्यकशिपु एक शक्तिशाली असुर राजा था जिसने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया था कि न देव, न असुर, न मनुष्य, न पशु, न शस्त्र, न अस्त्र — कोई उसे मार न सके। वह स्वयं को ईश्वर मानने लगा। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के कोध से बचाव के लिए प्रह्लाद ने भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकशिपु ने अनेक बार पुत्र को मारने का प्रयास किया — विष देकर, सर्पों से डंसवाकर, पहाड़ से गिराकर, अग्नि में डालकर — किंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद हर बार बच गए। अंत में खंभे से भगवान नरसिंह प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का वध किया।

इस कथा के प्रमुख संदेश:

भगवान सर्वत्र विद्यमान हैं — जब हिरण्यकशिपु ने पूछा — 'क्या तेरा विष्णु इस खंभे में भी है?' — प्रह्लाद ने कहा — 'हाँ, वह सर्वत्र है।' और भगवान नरसिंह खंभे से प्रकट हुए। शिक्षा — ईश्वर सर्वव्यापी हैं; उनकी उपस्थिति किसी एक स्थान तक सीमित नहीं।

भक्ति की अजेय शक्ति — प्रह्लाद एक बालक थे, उनके पास कोई शस्त्र या शक्ति नहीं थी — केवल भक्ति थी। फिर भी सर्वशक्तिमान पिता उन्हें नष्ट नहीं कर पाए। शिक्षा — सच्ची भक्ति सबसे बड़ा कवच है।

सत्य का मार्ग कठिन होता है, किंतु अंत में सत्य की विजय होती है — प्रह्लाद ने कभी झूठ का सहारा नहीं लिया। लाख कठिनाइयाँ आईं, किंतु वे अडिग रहे। शिक्षा — सत्य के मार्ग पर चलना कठिन है, किंतु उसका अंत सदा शुभ होता है।

ईश्वर भक्त की रक्षा करते हैं — प्रह्लाद ने कभी प्रार्थना नहीं की कि 'मुझे बचाओ' — वे तो भगवान की भक्ति में लीन थे। फिर भी भगवान स्वयं उनकी रक्षा को प्रकट हुए। शिक्षा — निष्काम भक्ति में ईश्वर स्वयं भक्त के रक्षक बनते हैं।

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