विस्तृत उत्तर
प्रह्लाद की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध में विस्तार से वर्णित है। यह नाम-भक्ति की सबसे शक्तिशाली उदाहरण-कथाओं में से एक है।
कथा — हिरण्यकशिपु एक अहंकारी असुर-राज था जो स्वयं को ब्रह्मांड का स्वामी मानता था और चाहता था कि सब उसी की पूजा करें। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था और 'नारायण-नारायण' का निरंतर जप करता था। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक यातनाएँ दीं — जहर दिया, हाथी से कुचलवाया, पहाड़ से फेंकवाया, समुद्र में डुबोया — परंतु नारायण-नाम के कारण प्रह्लाद पर कुछ भी असर नहीं हुआ।
होलिका और अग्नि परीक्षा — अंत में हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठना पड़ा। प्रह्लाद नारायण का नाम लेते रहे। होलिका जल गई परंतु प्रह्लाद सुरक्षित रहे। यही होलिका दहन का मूल है।
शास्त्र का संदेश — यह कथा यह सिखाती है कि नारायण की शरण और उनके नाम का जप सभी विपत्तियों में रक्षा करता है। प्रह्लाद की भक्ति में डर नहीं था, संकट में भी नाम न छूटा — यही सच्ची भक्ति है।





