विस्तृत उत्तर
अजामिल की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के छठे स्कंध में वर्णित है और यह नाम की शक्ति की सबसे चर्चित कथाओं में से एक है।
कथा — अजामिल कन्नौज का एक ब्राह्मण था जो बचपन में धर्मनिष्ठ था परंतु बाद में एक वेश्या के संपर्क में आकर चोरी, डकैती और अनैतिक आचरण में लिप्त हो गया। उसने अपने सबसे छोटे और प्रिय पुत्र का नाम 'नारायण' रखा था। मृत्यु के समय जब यमदूत उसे ले जाने आए तो उसने डर कर और पुत्र-मोह में अपने बेटे को बुलाने के लिए 'नारायण...नारायण' पुकारा।
नाम की शक्ति — विष्णु के पार्षद (विष्णुदूत) वहाँ प्रकट हुए और यमदूतों को रोका। उन्होंने कहा — 'जिसने 'भगवान नारायण' का नाम — चाहे अनजाने में ही — उच्चारित किया, वह पापी नहीं रहता।' अजामिल ने पुत्र के बहाने नारायण नाम लिया था, परंतु शक्ति तो नाम की थी।
परिणाम — इस अनुभव के बाद अजामिल को आत्म-बोध हुआ। वह हरिद्वार गया, नवधा भक्ति की, और अंततः वैकुण्ठ-धाम को प्राप्त हुआ। यमराज ने कहा — जिसकी जीभ से भगवान का नाम नहीं आया, उसे ही यमलोक ले जाना।
शास्त्र का संदेश — नाम किसी भी भाव से लिया जाए, उसकी शक्ति समान है। लेकिन अजामिल की पूर्ण मुक्ति केवल नाम-उच्चारण से नहीं, बाद की भक्ति और वैराग्य से हुई।





