विस्तृत उत्तर
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को किया जाता है। अगले दिन रंगों की होली (धुलेंडी) मनाई जाती है।
पौराणिक कथा: दैत्यराज हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। उसने विष्णु भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का षड्यन्त्र रचा। किन्तु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। यही 'बुराई पर अच्छाई की विजय' होलिका दहन है।
होलिका दहन विधि
1. होलिका स्थापना: पूर्णिमा से कुछ दिन पहले सार्वजनिक स्थान पर लकड़ी, उपले (गोबर के कंडे), सूखी पत्तियाँ एकत्रित करें। बीच में एक डंडा (प्रह्लाद का प्रतीक) गाड़ें।
2. शुभ मुहूर्त: भद्रा रहित समय में ही होलिका दहन करें। भद्रा काल में दहन अशुभ माना गया है।
1पूजन
- ▸होलिका के पास जाकर जल, रोली, अक्षत, फूल, गुड़, नारियल, नई फसल (गेहूँ बालियाँ, चना) अर्पित करें।
- ▸परिक्रमा करें (3, 5 या 7)।
- ▸मंत्र: 'असृक्पाभयसंत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।'
2दहन (अग्नि प्रज्वलन)
- ▸शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित करें।
- ▸नई फसल (गेहूँ बालियाँ, जौ) अग्नि में भूनें — इसे 'होला' कहते हैं।
- ▸'होलिका दहन' के जयघोष के साथ अग्नि को प्रणाम।
5. भुनी फसल प्रसाद: भुनी गेहूँ बालियाँ और चना प्रसाद के रूप में बाँटें।
6. परिक्रमा: दहन के बाद भी परिक्रमा करें। अग्नि की ज्वाला में बुराइयों को जलाने की कामना।
विशेष: होलिका दहन की अग्नि में पुराने-टूटे सामान, बेकार वस्तुएँ भी डालते हैं — पुरानी नकारात्मकता का त्याग।





