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संस्कार विधि📜 गृह्यसूत्र, वाल्मीकि रामायण, ब्रह्मांड पुराण2 मिनट पठन

विवाह में ध्रुव तारा और अरुंधति तारा क्यों दिखाते हैं?

संक्षिप्त उत्तर

ध्रुव तारा: स्थिरता (विवाह अचल), भक्त ध्रुव (दृढ़ संकल्प)। अरुंधति: पातिव्रत्य (वशिष्ठ पत्नी), आदर्श दम्पत्ति (सदा साथ), सूक्ष्म दृष्टि परीक्षा। विधि: सप्तपदी बाद, उत्तर दिशा। 'ध्रुवमसि ध्रुवं...' मंत्र।

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विस्तृत उत्तर

विवाह में नवदम्पत्ति को ध्रुव तारा और अरुंधति तारा दिखाना प्राचीन वैदिक परम्परा है:

ध्रुव तारा (Pole Star)

  1. 1स्थिरता: ध्रुव तारा आकाश में सदा स्थिर रहता है — अन्य तारे घूमते हैं, ध्रुव नहीं। नवदम्पत्ति को दिखाना = 'तुम्हारा प्रेम और विवाह ध्रुव तारे की भाँति अटल, अचल, स्थिर रहे।'
  2. 2भक्त ध्रुव: बालक ध्रुव ने कठोर तपस्या से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया = अटल स्थान प्राप्त। संदेश = 'दृढ़ संकल्प से सब सम्भव।'

अरुंधति तारा (Alcor — सप्तर्षि के पास)

  1. 1पातिव्रत्य: अरुंधति = महर्षि वशिष्ठ की पत्नी = आदर्श पतिव्रता। अरुंधति तारा = पातिव्रत्य/निष्ठा का प्रतीक।
  2. 2वशिष्ठ-अरुंधति युगल: सप्तर्षि मण्डल में वशिष्ठ तारे के अत्यंत निकट एक छोटा तारा = अरुंधति। दोनों = आदर्श दम्पत्ति — सदा साथ, कभी अलग नहीं।
  3. 3परीक्षा: अरुंधति तारा अत्यंत सूक्ष्म — दिखाई देना = तीक्ष्ण दृष्टि + ध्यान। नववधू को दिखाना = 'तुम्हारी दृष्टि सूक्ष्म और एकाग्र हो।'

विधि: सप्तपदी के बाद, रात्रि में, वर वधू को उत्तर दिशा में ध्रुव तारा दिखाता है। फिर सप्तर्षि मण्डल में अरुंधति दिखाता है।

मंत्र: 'ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवेद्ध मे।' (तू ध्रुव है, मैं तुझे ध्रुव (स्थिर) देखता हूँ।)

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शास्त्रीय स्रोत
गृह्यसूत्र, वाल्मीकि रामायण, ब्रह्मांड पुराण
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