विस्तृत उत्तर
शव से शिव तक की यह यात्रा, यानी जीव-भाव से ब्रह्म-भाव तक की यात्रा, अत्यंत दुर्गम है।
इसका सबसे बड़ा संदेश है एक सच्चे सद्गुरु की शरण ग्रहण करने की अनिवार्यता।
आज के इस भौतिकवादी युग में, जहाँ मन हर ओर भटक रहा है, एक ज्ञानी गुरु का मार्गदर्शन ही वह ध्रुव तारा है जो हमें संसार-सागर से पार ले जा सकता है।
समस्त साधनाओं का प्रारंभ और अंत श्रीगुरु के चरणों में ही होता है।
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