विस्तृत उत्तर
ध्रुवलोक स्वर्लोक की सर्वोच्च खगोलीय सीमा है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार ध्रुवलोक सप्तर्षि मंडल से भी 13 लाख योजन ऊपर स्थित है। यह स्वर्लोक का सबसे ऊपरी बिंदु है जहाँ स्वर्लोक समाप्त होता है और महर्लोक का आरंभ होता है। शिशुमार चक्र की धुरी ध्रुवलोक ही है। इसी धुरी के चारों ओर समस्त ग्रह, नक्षत्र और देवता काल-चक्र के अनुसार परिक्रमा करते हैं। जिस प्रकार बैल धान कूटने के खंभे से बंधे रहकर उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं उसी प्रकार ये समस्त ग्रह और देवता काल-चक्र से बंधे रहकर ध्रुवलोक की परिक्रमा करते हैं। ध्रुव महाराज की तपस्या के फलस्वरूप उन्हें यह स्थान प्राप्त हुआ था। गंगा नदी भी स्वर्गीय लोकों से आते समय सर्वप्रथम ध्रुवलोक में ध्रुव महाराज के मस्तक पर गिरती है।
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