गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय के अनुसार स्वर्ण-चोरी से कीट-पतंग योनि मिलती है, भूमि-हरण से विष्ठा का कीड़ा बनना पड़ता है, और घोर महापापी नरकभोग के बाद साँप-छिपकली जैसी सरीसृप योनि में जन्म लेते हैं।
गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में 'पापचिह्ननिरुपण' शीर्षक के अंतर्गत भगवान विष्णु विस्तार से बताते हैं कि कौन से पाप करने वाले किस नीच योनि में जन्म लेते हैं।
सरीसृप (साँप-छिपकली आदि) योनि और कीट-पतंग योनि विशेष रूप से उन महापापियों को प्राप्त होती है जो नरक-भोग के बाद पुनः पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।