विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में 'पापचिह्ननिरुपण' शीर्षक के अंतर्गत भगवान विष्णु विस्तार से बताते हैं कि कौन से पाप करने वाले किस नीच योनि में जन्म लेते हैं।
सरीसृप (साँप-छिपकली आदि) योनि और कीट-पतंग योनि विशेष रूप से उन महापापियों को प्राप्त होती है जो नरक-भोग के बाद पुनः पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार स्वर्ण-चोरी करने वाला कृमि, कीट और पतंग (कीड़े-मकोड़े) की योनि प्राप्त करता है। इसी प्रकार ब्रह्महत्यारा गधे, ऊँट और भैंस की योनि पाता है।
सरीसृप योनि विशेष रूप से उन लोगों का भाग्य है जो पराई स्त्री का हरण करते हैं, ब्राह्मण के धन का अपहरण करते हैं अथवा धरोहर चुराते हैं — ऐसे पापी ब्रह्मराक्षस बनते हैं या फिर नरकभोग के बाद साँप आदि विषैले सरीसृप की योनि में जन्म लेते हैं।
जो व्यक्ति भूमि को अपहरण करके उसे वापस नहीं करता, वह साठ हजार वर्षों तक विष्ठा का कीड़ा होता है। यह एक प्रकार की कीट योनि है।
गुरु की पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला क्रमशः तृण, गुल्म (झाड़ी) और लता की योनि पाता है। ये तीनों क्रमिक अधोगति के उदाहरण हैं।
इस प्रकार महापाप के कारण जीव का अधोपतन होता है — वह पहले घोर नरक भोगता है, फिर नरक-भोग समाप्त होने पर पृथ्वी पर सरीसृप, कीट, पतंग या अन्य नीच योनि में जन्म लेता है। यह क्रम तब तक चलता है जब तक उसके पाप का समूल क्षय नहीं हो जाता।





