विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में ऋण लेकर वापस न लौटाने वाले को स्पष्ट रूप से वैतरणी नदी में गिरने वाले पापियों की सूची में रखा गया है। भगवान विष्णु कहते हैं — 'जो ऋण लेकर उसे न लौटानेवाले, धरोहर का अपहरण करने वाले, विश्वासघात करने वाले हैं — ये सभी वैतरणी में गिरते हैं।'
यमलोक में इस पाप का दंड विशेष रूप से न्यायपूर्ण तरीके से दिया जाता है। धर्मशास्त्रीय परंपरा के अनुसार जब दोनों पक्ष — ऋण लेने वाला और ऋण देने वाला — यमलोक में मिलते हैं, तो जिसका धन लेकर मरा हो, वह अपना ऋण माँगता है। उस विवाद को जानकर यमदूत ऋण न चुकाने वाले का मांस काटकर उसे दे देते हैं जिसका ऋण लेकर मरे थे। यह दंड पाप की गंभीरता के अनुपात में होता है।
इसके अलावा, ऋण न चुकाने वाले को रौरव नरक की यातना भी भोगनी पड़ती है। यह नरक उन लोगों के लिए है जिन्होंने दूसरों की संपत्ति पर अनुचित अधिकार किया।
गरुड़ पुराण में यह भी कहा गया है कि मृत्युलोक में इस पाप का तत्काल फल भी मिलता है — ऋण न लौटाने वाले के घर की बरकत समाप्त हो जाती है, लक्ष्मी का प्रसाद नहीं मिलता और उसे निरंतर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि ऋण, पुत्र और शत्रु — इन तीनों को कभी अपने घर में नहीं छोड़ना चाहिए। ऋण चुकाना गृहस्थ का प्रमुख धर्म है।





