विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में भगवान विष्णु विस्तार से बताते हैं कि नरकभोग के बाद जब महापापी जीव मनुष्य योनि में जन्म लेता है, तो उसके पापों के चिह्न उसके शरीर पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस प्रकार उसकी पहचान संभव है।
कुछ प्रमुख पाप और उनके चिह्न इस प्रकार हैं — ब्रह्महत्यारा क्षय-रोगी होता है, गाय की हत्या करने वाला मूर्ख और कुबड़ा होता है, कन्या की हत्या करने वाला कोढ़ी होता है। मद्य पीने वाले के दाँत काले होते हैं। मांस-भक्षण करने वाले के अंग अत्यंत लाल होते हैं। लालचवश अभक्ष्य भोजन करने वाले ब्राह्मण को महोदर (उदर-रोग) होता है। श्राद्ध में अपवित्र अन्न देने वाला श्वेतकुष्ठी होता है।
गर्व से गुरु का अपमान करने वाला मिरगी का रोगी होता है। वेदशास्त्र की निंदा करने वाला पाण्डुरोगी होता है। झूठी गवाही देने वाला गूँगा, पंक्तिभेद करने वाला काना और पुस्तक चुराने वाला जन्मान्ध होता है। गाय और ब्राह्मण को पैर से मारने वाला लूला-लंगड़ा होता है।
जो दूसरे को दिये बिना मिठाई खाता है, उसे गले में गण्डमाला रोग होता है। परस्त्रीगमन करने वाला नपुंसक होता है।
इन चिह्नों के अतिरिक्त जो व्यक्ति अत्यंत दरिद्र, लम्बे समय से रोगग्रस्त, जन्मान्ध या जन्म से ही गम्भीर विकलांगता से युक्त होता है — शास्त्र की दृष्टि में यह उसके पूर्वजन्म के महापापों का संकेत हो सकता है। हालाँकि शास्त्र यह भी कहते हैं कि कठिन परिस्थिति भी परमात्मा की लीला हो सकती है — अतः किसी व्यक्ति के प्रति ऐसे आकलन में अत्यंत विनम्रता और सावधानी आवश्यक है।





