विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में भगवान विष्णु स्पष्ट कहते हैं — 'परस्त्रीगमन करने वाला नपुंसक और गुरु-पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला चर्म-रोगी होता है।'
इस दंड के पीछे शास्त्रीय तर्क यह है — परस्त्री के साथ अनुचित संबंध बनाने वाला व्यक्ति दूसरे की पत्नी का सौंदर्य और स्त्रीत्व का अनुचित उपभोग करता है। इस पाप में जो दुस्साहस और अनैतिक कामना होती है, उसका प्रतिफल अगले जन्म में नपुंसकता के रूप में आता है — जिसने जिस शक्ति का दुरुपयोग किया, वह शक्ति ही अगले जन्म में उससे छिन जाती है। यह 'जैसा कर्म, वैसा फल' का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में परस्त्री के साथ व्यभिचार करने वाले को भी वैतरणी में गिरने वाले पापियों में गिना गया है। नरकभोग के बाद अगले जन्म में नपुंसकता की योनि मिलती है।
गरुड़ पुराण में इससे जुड़े अन्य पाप-फल भी हैं — परस्त्री का हरण करने वाला ब्रह्मराक्षस होता है, उससे व्यभिचार करने वाला नपुंसक होता है। ये अलग-अलग स्तर के पाप हैं जिनके अलग-अलग दंड हैं।
इस उपदेश का व्यापक तात्पर्य यह है कि कोई भी पाप बिना फल के नहीं जाता — यह फल चाहे इसी जन्म में मिले या अगले जन्म में। शरीर का प्रत्येक अंग उसके पाप-कर्म का चिह्न बनकर जन्म-जन्मांतर तक साथ आता है।





