भगवान कण-कण में हैं — इसका क्या अर्थ?
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ईशोपनिषद (1): 'ईशावास्यमिदं सर्वं' — सब में ईश्वर। गीता (9.4): 'मया ततमिदं सर्वं जगत्' — मैं सम्पूर्ण जगत में व्याप्त। अर्थ: हर अणु-कण-प्राणी में वही एक ब्रह्म/चेतना विद्यमान है। यही अद्वैत, अहिंसा और पर्यावरण का आधार।
- 1ईशोपनिषद (श्लोक 1):
- 2भगवद्गीता (9.4):
- 3गीता (13.13): ब्रह्म 'सर्वतः पाणिपादं' — सर्वत्र हाथ-पैर वाला, सर्वत्र नेत्र-मुख वाला।
- 4श्वेताश्वतर उपनिषद (6.11):
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