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गीता के दूसरे अध्याय का सारांश क्या है?

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अध्याय 2 (सांख्य योग): (1) आत्मा अमर — 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्' (2.20), (2) कर्मयोग — 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' (2.47), 'समत्वं योग' (2.48), (3) स्थितप्रज्ञ — सुख-दुख में समभाव (2.55-56)। गीता के लगभग सभी सिद्धांतों का बीज।

  1. 1कृष्ण कहते हैं: तुम शोक के अयोग्य लोगों के लिए शोक कर रहे हो (2.11)।
  2. 2'न जायते म्रियते वा कदाचिन्' (2.20) — आत्मा न जन्मती है, न मरती, न कभी नष्ट होती।
  3. 3जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है (2.22)।
  4. 4'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (2.47) — गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक।
  5. 5निष्काम कर्म = बिना फल की इच्छा कर्म करना।
  6. 6'समत्वं योग उच्यते' (2.48) — सिद्धि-असिद्धि में समभाव ही योग है।
  7. 7अर्जुन पूछता है: स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) कैसा होता है?
  8. 8कृष्ण उत्तर देते हैं (2.55): जो सभी कामनाओं को त्यागकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है।
  9. 9जो दुखों में विचलित नहीं, सुखों में लालसा नहीं, राग-भय-क्रोध से मुक्त — वह स्थितप्रज्ञ (2.56)।
  10. 10इंद्रिय संयम, मन की स्थिरता, और वैराग्य की शिक्षा।
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