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ईशोपनिषद का मुख्य संदेश क्या है

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ईशोपनिषद (18 मंत्र) का सार — मंत्र 1: 'ईशावास्यमिदं सर्वं' — सब में ईश्वर। 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' — त्यागपूर्वक भोग करो। 'मा गृधः' — लोभ मत करो। कर्म + ज्ञान दोनों आवश्यक। गांधी: 'केवल पहला मंत्र बचे तो संपूर्ण हिंदू धर्म सुरक्षित।'

  1. 1ईश्वर सर्वव्यापी (मंत्र 1) — प्रत्येक वस्तु, प्राणी, कण में ईश्वर व्याप्त है। कोई स्थान ईश्वर से रहित नहीं।
  2. 2त्यागपूर्वक भोग (मंत्र 1) — 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' — संसार का भोग करो, परंतु त्याग (non-attachment) के साथ। यह गीता के निष्काम कर्म का मूल स्रोत है। भोगो, परंतु जोड़ो मत; उपयोग करो, परंतु अपना मत समझो।
  3. 3लोभ निषेध (मंत्र 1) — 'मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' — किसी के धन/संपत्ति पर लोभ मत करो। सब ईश्वर का है, किसी का व्यक्तिगत नहीं।
  4. 4कर्म और ज्ञान का समन्वय (मंत्र 2) — 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः' — कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा रखो। कर्म त्याज्य नहीं।
  5. 5विद्या-अविद्या समन्वय (मंत्र 9-11) — केवल अविद्या (कर्मकांड) या केवल विद्या (ज्ञान) — दोनों अधूरे हैं। दोनों का समन्वय आवश्यक।
  6. 6असतो मा सद्गमय (मंत्र 15-18):
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