'जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य' — का अर्थ क्या?
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शंकराचार्य (विवेकचूड़ामणि): ब्रह्म = परम सत्य, जगत = मिथ्या (न सत् न असत् — अनिर्वचनीय), जीव = ब्रह्म ही। 'मिथ्या' ≠ झूठा। रस्सी-साँप/स्वप्न उदाहरण। व्यावहारिक सत्ता (जगत सत्य) vs पारमार्थिक सत्ता (केवल ब्रह्म)।
- 1ब्रह्म सत्यम् — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है।
- 2जगत् मिथ्या — यह दृश्य जगत (संसार) मिथ्या है।
- 3जीवो ब्रह्मैव नापरः — जीवात्मा ब्रह्म ही है, कुछ और नहीं।
- 4सत् = जो सदा है, कभी बदलता नहीं (ब्रह्म)।
- 5असत् = जो कभी था ही नहीं (जैसे आकाश-कमल, खरगोश के सींग)।
- 6मिथ्या = जो न पूर्णतः सत् है, न पूर्णतः असत् — अनिर्वचनीय। जगत इसी श्रेणी में है — यह अनुभव होता है (इसलिए असत् नहीं), पर ज्ञान होने पर इसका वास्तविक स्वरूप बदल जाता है (इसलिए सत् नहीं)।
- 7रस्सी-साँप: अंधेरे में रस्सी साँप दिखती है — साँप मिथ्या है (न पूर्णतः सत् — क्योंकि प्रकाश में गायब, न असत् — क्योंकि अनुभव हुआ)। प्रकाश (ज्ञान) आने पर केवल रस्सी (ब्रह्म) दिखती है।
- 8स्वप्न: सपने में देखी दुनिया 'मिथ्या' है — सपने में सत्य लगी पर जागने पर असत्य। वैसे ही यह जाग्रत जगत भी ब्रह्मज्ञान होने पर 'मिथ्या' सिद्ध होता है।
- 9रामानुज ने इसका खंडन किया: जगत ब्रह्म ने रचा है, अतः मिथ्या नहीं हो सकता।
- 10अद्वैत उत्तर: व्यावहारिक दृष्टि से जगत सत्य है (व्यावहारिक सत्ता), पारमार्थिक दृष्टि से केवल ब्रह्म सत्य है (पारमार्थिक सत्ता)।
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