मंदिर की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कैसे होती है?
की चेकलिस्ट
प्राण प्रतिष्ठा: जड़ मूर्ति में देवता की चैतन्य शक्ति स्थापित करना। प्रक्रिया: कलश स्थापना → न्यास (आचार्य से मूर्ति में शक्ति प्रवाह) → प्राण प्रतिष्ठा मंत्र → नेत्रोन्मीलन (सबसे महत्वपूर्ण — सोने की सलाई से आँखें खोलना) → हवन → प्रथम पूजा। केवल दीक्षित आचार्य ही करा सकते हैं।
- 1मंदिर/स्थान का शुद्धिकरण (वास्तु शान्ति)
- 2मूर्ति को अन्न, जल, औषधि स्नान
- 3अधिवास (मूर्ति को मंदिर के पास रात्रि विश्राम)
- 4स्थापना मुहूर्त निर्धारण (ज्योतिषी द्वारा)
- 5नौ या अधिक कलश स्थापित (नवग्रह/दिक्पाल प्रतीक)
- 6प्रत्येक कलश में जल, पंचरत्न, सप्तधान्य, पंचगव्य
- 7आचार्य (प्रधान पुरोहित) अपने शरीर में देवता का न्यास करता है
- 8मातृका न्यास, अंग न्यास, कर न्यास
- 9फिर अपने शरीर से देवता की चैतन्य शक्ति मूर्ति में प्रवाहित करता है
- 10'इस मूर्ति में प्राण स्थापित हों।'
- 11सोने की सलाई या दर्भ (कुश) से मूर्ति की आँखें खोली जाती हैं
- 12इस क्षण मूर्ति 'देखने' लगती है — देवता की चैतन्य शक्ति सक्रिय
- 13सर्वप्रथम दर्शन (First Darshan) — दर्पण में देवता को अपना प्रतिबिम्ब दिखाया जाता है
- 14प्राण प्रतिष्ठा हवन — 108/1008 आहुतियाँ
- 15नवग्रह हवन
- 16वास्तु हवन
- 17हवन की पूर्णाहुति
- 18मूर्ति को वस्त्र, आभूषण, पुष्प से सजाना
- 19प्रथम भोग और आरती
- 20ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा
- 21केवल वेद-आगम विज्ञ, दीक्षित आचार्य
- 22सामान्य पुजारी नहीं — विशेष योग्यता आवश्यक
- 23मूर्ति = साक्षात् देवता — सजीव/चैतन्य
- 24नित्य पूजा अनिवार्य (एक दिन भी न छूटे)
- 25मूर्ति को अनादर, उपेक्षा = दोष
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