विस्तृत उत्तर
प्राण प्रतिष्ठा हिन्दू धर्म की वह अत्यन्त महत्वपूर्ण विधि है जिसके द्वारा एक पत्थर/धातु की मूर्ति में देवता की चैतन्य शक्ति का आवाहन और स्थापना की जाती है। इसके बिना मूर्ति 'जड़' रहती है — प्राण प्रतिष्ठा के बाद वह 'सजीव' और 'पूजनीय' बन जाती है।
सिद्धांत
अग्निपुराण: 'प्राणं प्रतिष्ठापयति यया सा प्राणप्रतिष्ठा।' — जिस विधि से प्राण (चैतन्य) की स्थापना हो वह प्राण प्रतिष्ठा है।
प्राण प्रतिष्ठा की विस्तृत प्रक्रिया
1पूर्व तैयारी (1-3 दिन पहले)
- ▸मंदिर/स्थान का शुद्धिकरण (वास्तु शान्ति)
- ▸मूर्ति को अन्न, जल, औषधि स्नान
- ▸अधिवास (मूर्ति को मंदिर के पास रात्रि विश्राम)
- ▸स्थापना मुहूर्त निर्धारण (ज्योतिषी द्वारा)
2कलश स्थापना
- ▸नौ या अधिक कलश स्थापित (नवग्रह/दिक्पाल प्रतीक)
- ▸प्रत्येक कलश में जल, पंचरत्न, सप्तधान्य, पंचगव्य
3न्यास (शरीर में देवता का आवाहन)
- ▸आचार्य (प्रधान पुरोहित) अपने शरीर में देवता का न्यास करता है
- ▸मातृका न्यास, अंग न्यास, कर न्यास
- ▸फिर अपने शरीर से देवता की चैतन्य शक्ति मूर्ति में प्रवाहित करता है
4प्राण प्रतिष्ठा मंत्र
ॐ आं ह्रीं क्रों...(देवता विशिष्ट बीज मंत्र)...अस्यां प्रतिमायां प्राणाः प्रतिष्ठन्तु।
— 'इस मूर्ति में प्राण स्थापित हों।'
5नेत्रोन्मीलन (सबसे महत्वपूर्ण क्षण)
- ▸सोने की सलाई या दर्भ (कुश) से मूर्ति की आँखें खोली जाती हैं
- ▸इस क्षण मूर्ति 'देखने' लगती है — देवता की चैतन्य शक्ति सक्रिय
- ▸सर्वप्रथम दर्शन (First Darshan) — दर्पण में देवता को अपना प्रतिबिम्ब दिखाया जाता है
6हवन
- ▸प्राण प्रतिष्ठा हवन — 108/1008 आहुतियाँ
- ▸नवग्रह हवन
- ▸वास्तु हवन
7पूर्णाहुति और प्रथम पूजा
- ▸हवन की पूर्णाहुति
- ▸मूर्ति को वस्त्र, आभूषण, पुष्प से सजाना
- ▸प्रथम भोग और आरती
- ▸ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा
प्राण प्रतिष्ठा कौन करा सकता है
- ▸केवल वेद-आगम विज्ञ, दीक्षित आचार्य
- ▸सामान्य पुजारी नहीं — विशेष योग्यता आवश्यक
प्राण प्रतिष्ठा के बाद
- ▸मूर्ति = साक्षात् देवता — सजीव/चैतन्य
- ▸नित्य पूजा अनिवार्य (एक दिन भी न छूटे)
- ▸मूर्ति को अनादर, उपेक्षा = दोष





