मंदिर में प्राणायाम और ध्यान करने का क्या नियम है?
की चेकलिस्ट
मंदिर ध्यान: मंडप/प्रांगण में शांत कोना। प्रातः/संध्या — भीड़ से बचें। आसन पर पद्मासन/सुखासन। प्राणायाम: अनुलोम-विलोम (मन्द), गहरी श्वास। ध्यान: मूर्ति देखें→आँखें बंद→मन में धारण, या मानसिक मंत्र जप। 10-30 मिनट। अन्य भक्तों को बाधा न दें। मंदिर ऊर्जा = ध्यान गहरा।
- 1गर्भगृह के बाहर — मंडप या प्रांगण में
- 2शांत कोना — अन्य भक्तों को बाधा न हो
- 3गर्भगृह के अंदर ध्यान = प्रायः अनुमत नहीं (भीड़/नियम)
- 4कछुए (कूर्मासन) या बलिपीठ के पास = कुछ दक्षिण भारतीय मंदिरों में ध्यान स्थान
- 5प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) — सर्वोत्तम (मंदिर खुलने पर)
- 6संध्या काल — शुभ
- 7आरती के बाद — मंदिर शांत हो तब
- 8भीड़ के समय ध्यान कठिन — शांत समय चुनें
- 9पद्मासन/सुखासन में बैठें
- 10आसन (कपड़ा/चटाई) बिछाएँ — सीधे भूमि पर न बैठें
- 11रीढ़ सीधी, आँखें बंद
- 12अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन) — 5-10 मिनट
- 13भ्रामरी — मंदिर में ध्वनि उत्पन्न न हो इसलिए मन्द स्वर में
- 14कपालभाति — मन्द गति से (तेज़ आवाज़ से अन्य बाधित)
- 15सामान्य गहरी श्वास — सबसे सरल
- 16गर्भगृह में देवता की मूर्ति देखें → आँखें बंद करें → मूर्ति का स्वरूप मन में धारण करें
- 17या मंत्र जप (मानसिक — मुख से उच्चारण न करें) — 'ॐ नमः शिवाय' / 'ॐ नमो नारायणाय'
- 18या केवल श्वास पर ध्यान
- 1910-30 मिनट (या अधिक)
- 20अन्य भक्तों के आवागमन में बाधा न बनें
- 21गलियारे/मार्ग में बैठकर ध्यान न करें
- 22शरीर सीधा — सोएँ नहीं
- 23ध्यान के बाद प्रणाम कर उठें
- 24मंदिर का सात्विक वातावरण = ध्यान गहरा और शीघ्र
- 25देवता की चैतन्य ऊर्जा = ध्यान में आध्यात्मिक अनुभव
- 26घर से भिन्न — बाहरी विक्षेप कम (यदि शांत समय चुनें)
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