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मंत्र जप में 108 संख्या का महत्व क्या है?

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108 = ब्रह्मांडीय पूर्णता की संख्या। सूर्य-चंद्र की दूरी 108 गुना। 12 राशि × 9 ग्रह = 108। 27 नक्षत्र × 4 चरण = 108। 108 उपनिषद। शरीर में 108 मर्म स्थान। एक माला = 108 मनके = एक पूर्ण ऊर्जा-चक्र। प्रत्येक देवता के 108 नाम (अष्टोत्तरशत)।

  1. 1सूर्य का व्यास × 108 ≈ पृथ्वी से सूर्य की दूरी
  2. 2चंद्रमा का व्यास × 108 ≈ पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी
  3. 3यह संयोग नहीं — 108 ब्रह्मांड की मूल संख्या है।
  4. 4उपनिषदों की कुल संख्या 108 है (मुक्तिकोपनिषद में 108 उपनिषदों की सूची)
  5. 5ऋग्वेद में 10,800 श्लोक (108 × 100)
  6. 6108 = 1 (ब्रह्म) × 8 (अष्टप्रकृति) × 10 (दश दिशाएं... यह पारंपरिक व्याख्या है)
  7. 7तंत्रसार: 108 जप = एक पूर्ण चक्र (एक माला)। एक माला = साधक की एक 'श्वास-चक्र' की ऊर्जा का पूर्ण उपयोग।
  8. 812 राशियाँ × 9 ग्रह = 108
  9. 927 नक्षत्र × 4 चरण = 108
  10. 10अर्थात् 108 जप = सम्पूर्ण ज्योतिषीय चक्र का एक बार पूर्ण होना।
  11. 11विष्णुसहस्रनाम = 1000 नाम (लगभग 108 × 9)
  12. 12ललितासहस्रनाम = 1000 नाम
  13. 13अष्टोत्तरशत नाम = 108 नाम — प्रत्येक देवता के 108 नाम।
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