मंत्र जप में श्रद्धा और विश्वास का कितना महत्व है?
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श्रद्धा = मंत्र की आत्मा। गीता: 'श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्', 'संशयात्मा विनश्यति'। पतंजलि: श्रद्धा → वीर्य → स्मृति → समाधि (श्रद्धा प्रथम)। श्रद्धा = 90%, विधि = 10%। बिना श्रद्धा = तोते का रटना। 'भक्तिहीनं...परिपूर्णं तदस्तु मे'।
- 1गीता (4.39): 'श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्' — श्रद्धावान ज्ञान प्राप्त करता है।
- 2गीता (17.3): 'श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः' — मनुष्य श्रद्धामय है — जैसी श्रद्धा, वैसा वह।
- 3पतंजलि (1.20): 'श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्' — श्रद्धा, वीर्य (ऊर्जा), स्मृति, समाधि — ये क्रमशः सिद्धि देते हैं। श्रद्धा प्रथम है।
- 4गीता (4.40): 'संशयात्मा विनश्यति' — संदेही नष्ट होता है।
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